जहाँ श्री गुरु की निन्दा हो, हे अम्बिके! वहाँ से दोनों कान बन्द कर तुरन्त चला आये, जिससे पुनः वह शब्द न सुनाई पड़े। बाद में प्रायश्चित्त रूप से गुरुनाम का स्मरण करे।
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