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कुलार्णव • अध्याय 12 • श्लोक 78
यत्र श्रीगुरुनिन्दा स्यात् पिधाय श्रवणेऽम्बिके । सद्यस्तस्माद्विनिष्क्रामेत् पुनर्न श्रवणं यथा । गुरोर्नाम स्मरेत् पश्चात् श्रवणे सा प्रतिक्रिया ॥
जहाँ श्री गुरु की निन्दा हो, हे अम्बिके! वहाँ से दोनों कान बन्द कर तुरन्त चला आये, जिससे पुनः वह शब्द न सुनाई पड़े। बाद में प्रायश्चित्त रूप से गुरुनाम का स्मरण करे।
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