गुरोर्हितं हि कर्त्तव्यं मनोवाक्कायकर्मभिः ।
अहिताचरणाद्देवि विष्ठायां जायते क्रिमिः ॥
गुरु को जो प्रिय हो, वही मन, वचन, शरीर एवं कर्म द्वारा करे। हे देवि! उनका अप्रिय करने से विष्ठा में कीड़े का जन्म मिलता है।
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