रिक्तहस्तश्च नोपेयाद्राजानं देवतां गुरुम् । फलपुष्पाम्बरादीनि यथाशक्त्या समर्पयेत् ॥ एवं यो न चरेद्देवि ब्रह्मराक्षसतां व्रजेत् ।
राजा, देवता और गुरु के पास खाली हाथ न जाय। यथा-शक्ति फल, पुष्प, वस्त्रादि अर्पित करे। हे देवि! ऐसा जो नहीं करता, वह ब्रह्म-राक्षस होता है।
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