अध्याय 10 — दशमोल्लासः
कुलार्णव
103 श्लोक • केवल अनुवाद
इसी क्रम से नवमी के दिन एक वर्ष से नौ वर्ष तक की कन्याओं की पूजा करे।
ये नौ कन्याएँ क्रमशः— १. बाला, २. शुद्धा, ३. ललिता, ४. मालिनी, ५. वसुन्धरा, ६. सरस्वती, ७. रमा, ८. गौरी और ९. दुर्गा कही गई हैं। आदि में तीन प्रणव (ॐ ॐ ॐ), अन्त में 'नमः' पद, 'देवता' एवं 'कन्या' के चतुर्थ्यन्त नाम लगाकर अलग अलग उन कन्याओं का पूजन करना चाहिए।
(विमर्श— इनके पूजन के मन्त्र इस प्रकार हैं— १. ॐ ॐ ॐ बालायै देवतायै नमः, २. ॐ ॐ ॐ शुद्धायै देवतायै नमः, ३. ॐ ॐ ॐ ललितायै देवतायै नमः, ४. ॐ ॐ ॐ मालिन्यै देवतायै नमः, ५. ॐ ॐ ॐ वसुन्धरायै देवतायै नमः, ६. ॐ ॐ ॐ सरस्वत्यै देवतायै नमः, ७. ॐ ॐ ॐ रमायै देवतायै नमः, ८. ॐ ॐ ॐ गौर्य देवतायै नमः, ९. ॐ ॐ ॐ दुर्गायै देवतायै नमः। इन मन्त्रों से इनकी अलग अलग पूजा करे।)
ब्राह्मी आदि आठ मातृकाएँ और असिताङ्ग आदि आठ भैरव अपने मंगलादि मिथुनों सहित मूलाष्टक हैं।
(विमर्श— ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, चामुण्डा, कौमारी, अपराजिता, बाराही और नारसिंही — ये आठ कुलाष्टक है। बृहत्तन्त्रसार, पृ० ५३१ दसर्वां Edition । वामकेश्वर तन्त्रान्तर्गत नित्याषोडशिकार्णव (१. १६९-१७१) में कुछ अन्तर है — ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐन्द्री, चामुण्डा और महालक्ष्मी। अष्टाङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त भैरव, कपाली, भीषण और संहार — ये आठ भैरव है — पुरश्चर्यार्णव।)