मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 10 — दशमोल्लासः

कुलार्णव
103 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! मैं विशेष दिनों की पूजा के विषय में सुनना चाहती हूँ। हे देव! हे परमेश्वर! साथ ही उस पूजा का फल भी मुझे बताइए।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! जो आपने पूछा है, उसे मैं कहूँगा। उसके सुनने मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिलती है।
हे देवि! १. नित्यपूजा उत्तम है, २. पर्वपूजा मध्यम है और ३. मानस पूजा अधम है। एक मास से अधिक समय पूजा किये बिना बीत जाने पर साधक 'पशु' हो जाता है।
मास भर बाद विहित मादि (पञ्चमकार) द्रव्यों से पूजन होने पर यदि 'पशु' की उसमें सम्मिलित होने की इच्छा हो, तो उसकी पुनः दीक्षा करे।
मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन - ये पञ्चमकार देवता को प्रसन्न करते हैं।
हे ईशानि! पञ्चमकारों का सेवन देवता की प्रसन्नता के लिए यथाविधि करना चाहिये। यदि तृष्णावश उनका सेवन कोई करता है, तो वह पापी होता है।
कृष्णाष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति - इन पुण्य दिनों में पाँच पर्व होते हैं।
गुरु, परम गुरु, परापर गुरु, मानवौघादि पुरुषों के और अपने जन्मदिन के अवसर पर पूजन करे।
सम्पत्ति मिलने या धन आदि का लाभ होने पर, तप, दीक्षा और व्रत आदि उत्सव में, किसी पीठ में जाने पर, वीरपीठ में, अपने कुटुम्बी के मिलने पर, देशिक के आने पर, पुण्य तीर्थ या देवता का दर्शन होने पर पूजन करे।
हे देवेशि! इस प्रकार के (पुण्य) दिनों में और विशेष दिनों में जैसा धन हो, जैसी श्रद्धा हो, जैसा हव्य द्रव्य हो, जैसा उचित हो, जैसा समय हो, जैसा देश हो, वैसा ही पूजन करना चाहिये।
चक्रपूजा आचार्य के द्वारा विधिपूर्वक करानी चाहिए अपना हे देवि! स्वयं ही बिन्दुपूजा में तत्पर होकर चक्र पूजा करनी चाहिए।
ऐसा करने वाला सत्यलोक को प्राप्त होता है, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता किन्तु जो कौलिक मोहवश पूजा नहीं करता, उसे देवता का शाप लगता है।
मास में या ३ मास में छः मास में या एक वर्ष में भक्तिपूर्वक श्रीगुरुदेव का पूजन करे। वे न हों, तो उनकी पत्नी, पुत्रादि की पूजा करे।
वे भी न हों, तो उनके कुलज्ञ शिष्य को या अन्य कुलयोगी को कुलपूजापूर्वक कुलद्रव्यों से सन्तुष्ट करे।
रोगों में, आपत्तियों में, कठिन परिस्थितियों में तथा दुष्ट के संग होने पर उनके दोषों को शान्ति के लिए योगिनीसमूह का पूजन करे।
हे कुलेश्वरि! जहाँ (पश्चाम्नायों में से) एक आम्नायतत्त्व का ज्ञाता एक कुलाचार्य हो और तीन, चार या पाँच कौलिक तथा शक्तियाँ हों, वहाँ हे देवि! उनकी अलग अलग वा मिचुनाकाररूप में गन्धाक्षत पुष्यादि से पूजा कर हे देवेशि! उन्हें छः रसों से मुक्त भक्ष्य-भोज्य मांसादि पदार्थों से सन्तुष्ट करे।
प्रौढोल्लास के सहित यदि वे वहाँ रहते हैं, तो इसे 'श्री चक्र' कहा जाता है और वही उनका 'वृन्द' भी कहा जाता है।
आश्विन मास में नौ कुमारियों की पूजा करे। शुद्ध मन से साधक प्रातःकाल भक्तिपूर्वक उन्हें निमन्त्रण दे।
प्रतिपदा के दिन एक वर्ष की मनोहर और शुभ लक्षण वाली बालिका को स्नान कराकर शुद्ध आत्मा से साधक क्रमपूर्वक पूजा करे।
तैल, स्नानादि से शुद्ध उस बाला को पूजागृह में लाकर देवता के समीप बैठाकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप एवं कुलदीपकों से उसकी पूजा करे । फिर दूध, घी, मधु, मांसादि भोज्य अन्न पानादि और केला, नारियल आदि फलों से उसे सन्तुष्ट करे।
स्वयं शक्ति सहित प्रौढ़ोल्लास पर्यन्त आनन्दयुक्त होकर, हे देवि! उस सुशोभिता बाला को देखता हुआ अपने इष्ट देवता का स्मरण करे और यमाशक्ति एक से अधिक मन्त्र का जप करे। तब उसे देवता बुद्धि से नमस्कार कर विसर्जित करे।
द्वितीया तिथि में दो वर्ष की कन्या का और पूर्व तिथि में पूजिता एक वर्ष की कन्या का पूजन पूर्ववत् करे।
इसी क्रम से नवमी के दिन एक वर्ष से नौ वर्ष तक की कन्याओं की पूजा करे । ये नौ कन्याएँ क्रमशः १. बाला, २. शुद्धा, ३. ललिता, ४. मालिनी, ५. वसुन्धरा, ६. सरस्वती, ७. रमा, ८. गौरी और ९. दुर्गा कही गई हैं। आदि में तीन प्रणव (ॐ ॐ ॐ), अन्त में 'नमः' पद, 'देवता' एवं 'कन्या' के चतुर्थ्यन्त नाम लगाकर अलग अलग उन कन्याओं का पूजन करना चाहिए। विमर्श - इनके पूजन के मन्त्र इस प्रकार हैं - १. ॐ ॐ ॐ बालायै देवतायै नमः, २. ॐ ॐ ॐ शुद्धायै देवतायै नमः, ३. ॐ ॐ ॐ ललितायै देवतायै नमः, ४. ॐ ॐ ॐ मालिन्यै देवतायै नमः, ५. ॐ ॐ ॐ वसुन्धरायै देवतायै नमः, ६. ॐ ॐ ॐ सरस्वत्यै देवतायै नमः, ७. ॐ ॐ ॐ रमायै देवतायै नमः, ८. ॐ ॐ ॐ गौर्य देवतायै नमः, ९. ॐ ॐ ॐ दुर्गायै देवतायै नमः। इन मन्त्रों से इनकी अलग अलग पूजा करे।
इनके साथ ही पाँच वर्ष के बालक की 'वटुक' रूप में और नौ वर्ष के बालक की 'गणेश' रूप में यथाशक्ति गन्ध, पुष्प, वस्वादि द्वारा पूजा करे।
इन सबको देवता समझते हुए धन की कंजूसी न करते हुए अपने कार्य की सिद्धि के लिए विविध पदार्थों से इन्हें सन्तुष्ट करे।
हे देवी! इस प्रकार नवरात्र में एकोत्तरवृद्धि के क्रम से अप करे और नवरात्र में की हुई पूजा देवी को समर्पित करे।
ताम्बूल एवं द्रव्य दक्षिणा देकर उक्त कुमारियों को विदा करे। इस प्रकार जो प्रति वर्ष नौ कुमारियों का अर्चन करता है, वह पुण्यात्मा देवता की प्रसन्नता को प्राप्त करता है और अपनी मनोकामना को पाकर वह आपके पास निवास करता है।
अथवा हे पार्वति! यदि सुन्दर युवा स्त्रियाँ सुलभ हों, तो नवरात्रों में मन्त्रज्ञ साधक भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करे।
पूर्ववत् १. हल्लेखा, २. गगना, ३. रक्ता, ४. महोच्छष्मा, ५. करालिका, ६. इच्छा, ७. ज्ञाना, ८. क्रिया और ९. दुर्गा - इन नामों से और बटुक तथा गणेश रूप में बालकों का पूजन कर उन्हें मद्यादि पदार्थों से सन्तुष्ट करे।
हे प्रिये! 'प्रौढान्त' उल्लास से युक्त होकर यदि वे सन्तुष्ट होते हैं, तो साधक उन देवों को प्रसन्न करने में सफल होता है और आपके समीप निवास करता है।
इस प्रकार जो साधक प्रति वर्ष या छः मास में या तीन मास में या प्रति मास ३, ५ या ७ कन्याओं या युवतियों को देवता समझकर पूजा करता है, हे प्रिये! वह सभी ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर हम दोनों को प्रिय होता है।
शुक्रवार में हे कुलेशानि! सर्वलक्षण-सम्पन्ना, अनुकूल एवं मनोरमा, मन्दहासा, पुष्पिणी, युवा, कुलाष्टक से युक्त कुलस्त्री को सादर निमन्त्रितकर शुद्धोदक से स्नान द्वारा शुद्धदेह कराकर आसन पर बैठाये एवं विधि विधान से गन्ध, पुष्प एवं वस्त्रादि से उसे सजाए। तदनन्तर साधक अपने को भी, हे कुलेश्वरि! गन्धपुष्पादि से अलंकृत करे।
फिर उसमें देवता का आवाहन कर न्यासक्रम से क्रमार्चन कर धूप, कुलदीपकों को दिखाकर हे देवि! उसे देवता समझते हुये छः रसों से युक्त मांसादि भक्ष्य भोज्यादि पदार्थों से भक्तिपूर्वक सन्तुष्ट करे।
फिर 'प्रौढान्त' उल्लास से युक्त भक्तिभाव से उन्हें देखता हुआ मन्त्र का जप करे। स्वयं यौवनोल्लास से युक्त रहे और देवी का ध्यान करता रहे।
इस प्रकार निर्विकार रूप से १००८ जप कर जपादि का समर्पण करे और उसके साथ रात्रि व्यतीत करे।
हे प्रिये! तीन, पाँच, सात या नौ शुक्रवारों में जो इस विधि से पूजा करता है, उसके पुण्य की गणना नहीं की जा सकती।
हे कुलेश्वरि! चारों पीठों के अर्चन का फल वह पाता है और जो जो उसकी मनोकामना होती है, वह सब निस्सन्देह पूरी होती है।
अथवा नवमी के दिन इसी विधान से विधिज्ञ साधक पूजा कर स्तोत्रों से पूजन करे, तो सभी महान् ऐश्वयों को प्राप्त करता है।
हे प्रिये! अथवा कर्क, मकर, तुला, सिंह, मेष या सभी (सूर्य) संक्रान्तियों में मिथुनार्चन करे।
१. गौरी-शिव, २. रमा-विष्णु, ३. वाणी-ब्रह्मा, ४. शची-इन्द्र, ५. रोहणी-चन्द्र, ६. स्वाहा-अग्नि, ७. प्रभा-रवि, ८. काली-वीरभद्र और ९. भैरवी-भैरव - इन नौ मिथुनों (युगलों) का पूजन पूर्वोक्त विधि से करे।
प्रत्येक नाम के आदि में तीन 'तार' (ॐ) और अन्त में 'नमः' लगाकर अर्थात् 'ॐ ॐ ॐ गौरीशिवाभ्यां नमः' इत्यादि मन्त्रों से विधानवित् साधक गन्ध पुष्पादि से पूजा कर मद्यादि से सन्तुष्ट करे।
फिर उन्हें 'प्रौढान्त' उल्लास से युक्त मिथुन रूप में ध्यान करे। ऐसा करने से मिथुन देवता सन्तुष्ट होकर साधक पर अनुग्रह करते हैं और हे देवि! उसकी मनोकामना पूरी करते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
प्रतिवर्ष भक्तिपूर्वक जो मिथुनार्चन करता है, वह सब ऐश्वर्यों से युक्त होकर आपके लोक में निवास करता है।
हे ईश्वरि! वैशाख मास की शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्राह्म मुहूर्त में उठकर स्नान एवं सन्ध्या से निवृत्त हो मनोरम एकान्त स्थान में पूर्व की ओर मुख करके बैठे। फिर विधिपूर्वक अपने आपको गन्ध पुष्पादि से अलंकृत कर पूर्वोक्त न्यासों को कर देवभाव को प्राप्त करे।
हे प्रिये! सूर्यमण्डल के कुछ उदित होने पर इष्टदेवता का आवरणों के सहित ध्यान कर षोडशोपचारों से चक्रपूजायुक्त पूजन करे।
उसके बाद कुलदीपों से नीराजन कर गुरुरूप शिव को मत्स्य-मांसादि भक्ष्य-भोज्यादि सहित अर्घ्य निवेदित करे और स्वयं उनके प्रसाद को शक्ति के साथ यौवनोल्लास से युक्त होकर निर्विकार चित्त से भक्तिपूर्वक पान करे।
देवी के उक्त मण्डल का ध्यान करते हुये १०८ बार जप करे। फिर जप समर्पित कर पूजा और देवता का विसर्जन करे।
हे अम्बिके! इस प्रकार शुक्ल प्रतिपदा के शुभ दिन से प्रारम्भ कर कृष्ण चतुर्दशी के दिन तक जप पूजा करे और हे देवि! अमावास्या के दिन कृपणता छोड़कर यथाशक्ति तीन, पाँच, सात या नौ शक्तियों तथा कौलिकों का पूजन करे।
इस प्रकार एक मास तक जो साधक सूर्योदय का अर्चन करता है, उससे देवता सन्तुष्ट होकर उसे अभीष्ट फल प्रदान करते हैं।
हे प्रिये! इसी क्रम से मध्याह्न या सायाह्न में भी (सूर्य) पूजा की जा सकती है। यह तीनों सन्ध्याओं की पूजा भी वही फल देती है और साधक योगिनियों का प्रिय हो जाता है।
जो साधक तीनों सन्ध्याओं में एक मास तक इस प्रकार विधानानुसार पूजा करता है, वह अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर पृथ्वी पर देववत् विहार करता है।
माघ शुक्ल की प्रतिपदा के दिन निराहार रह कर स्नानपूर्वक श्वेत वस्त्र पहन कर सायं सन्ध्या करे।
फिर पूर्वोक्त सूर्यपूजा में कही गई विधि से सभी द्रव्यों से तथा स्वयं यौवन के उल्लास से युक्त होकर चन्द्र में स्थित देवता का ध्यान करते हुये चन्द्रमा के अस्त होने के समय तक एकाग्रचित्त से मन्त्रजप करे। इस प्रकार प्रतिदिन माघ शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी पर्यन्त पूजा करनी चाहिए।
अन्त में पूर्णिमा के दिन यथाशक्ति शक्तियों और कौलिकों की पूजा करे। हे प्रिये! भक्तिपूर्वक शुक्लपक्ष का यह पूजन जो करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर सब लोगों से पूजित होता है और शिव के समान होकर पृथ्वी पर रहता है।
शुक्लपक्ष के समान ही कृष्णपक्ष का पूजन भी वैसा ही फलप्रद है। जो विधिपूर्वक इसे करता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और इस संसार में सभी सुखों का उपभोग कर देवता के समान दर्शनीय होता है तथा योगिनी वीर के सम्मिलन का आनन्द प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं।
कार्तिक में इष्टदेवता का अर्चन हे ईश्वरि! कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा को स्नान एवं आचमन उपासना के द्वारा विशुद्धात्मा हो पूर्वोक्त न्यासों को करे।
फिर जीव लोक के सो जाने पर आनन्दपूर्वक महानिशा में पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर हे पार्वति! घृत की एक मोटी बत्ती जलाकर पांच रंगों के चूर्ण से चित्रित अष्टदल कमल बनाये। उस पर कांसे का सुन्दर कलश मधु से भर कर स्थापित करे। कलश पर उत्तराभिमुख घृत का दीपक अपने सामने जला कर स्थापित करे।
दीपक की बत्ती अनामिका के समान मोटी हों उत्तर की ओर मुख कर साधक कलश के सामने बैठे एवं उक्त दीपक की ज्योति में आवरण सहित देवी का ध्यानकर विधिवत् उसकी पूजा करे। फिर यौवनोल्लास से युक्त होकर दीपस्य देवता का स्मरण करते हुए एकाग्र मन से १००८ बार जप करे।
इस प्रकार कृष्ण चतुर्दशी के दिन तक पूजा करे। अमावास्या के दिन भक्तिपूर्वक कुलशक्तियों का पूजन करे। हे कुलेशानि! ऐसा करने से साधक देवता की प्रीति प्राप्त करता है और सभी कामनाओं से समृद्ध होकर तथा सब प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त होकर सबसे सम्मानित होता हुआ पृथ्वी पर सुखपूर्वक विचरण करता है।
अहाष्टक की पूजा-यदि समर्च हो, आठ अष्टकों की पूजा एक दिन में करे। अथवा हे देवि! ८, १६, ३२ या ६४ दिनों में पूजाक्रम के ज्ञाता गुरु द्वारा पूजन कराए। यदि साधक क्रम का ज्ञाता हो, तो स्वयं ही कृपणता को छोड़कर पूजा करे।
ब्राह्मी आदि आठ मातृकाएँ और असिताङ्ग आदि आठ भैरव अपने मंगलादि मिथुनों सहित मूलाष्टक हैं। विमर्श - ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, चामुण्डा, कौमारी, अपराजिता, बाराही और नारसिंही - ये आठ कुलाष्टक है। बृहत्तन्त्रसार, पृ० ५३१ दसर्वां Edition । वामकेश्वर तन्त्रान्तर्गत नित्याषोडशिकार्णव (१. १६९-१७१) में कुछ अन्तर है - ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐन्द्री, चामुण्डा और महालक्ष्मी। अष्टाङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त भैरव, कपाली, भीषण और संहार - ये आठ भैरव है - पुरश्चर्यार्णव ।
मूलाष्टकों से उद्भूत अक्षोभ्य आदि ६४ मिथुन कुलागम में प्रसिद्ध है उनकी पूजा करे।
पूर्वोक्त विधान से यथाशक्ति उनकी पूजा करे। अपने अभीष्ट कार्य को सिद्ध करने के लिये क्रम का लोप न करे। गन्ध, पुष्पाक्षत, मत्स्य, मांस, मद्य, भक्ष्य, भोज्य आदि छः रसों से युक्त पदार्थों आदि से मिधुनों को हे देवि! अति भक्ति के साथ अच्छी तरह सन्तुष्ट करे। हे अम्बिके! प्रौढान्त उल्लास तक श्री चक्रार्चन करे।
इस प्रकार जो एक बार अष्टाष्टक की पूजा करता है, वह ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवताओं द्वारा पूजित होता है। फिर मनुष्यों की क्या बात। बह साक्षात् शिव ही होता है।
इस पूजन से वह ६४ योगिनियों द्वारा संस्तुत होकर पुनर्जन्म से छूटकर आपके पास रहता है। हे परमेश्वरि! इससे सभी देवता प्रसन्न होते हैं। अतः इससे श्रेष्ठ अन्य पूजा नहीं है, यह निस्सन्देह सत्य है।
हे प्रिये! इस प्रकार के अष्टाष्टक चक्र का जो भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह करोड़ों यज्ञ, दान, तप, तीर्थ एवं व्रत का फल पाता है।
हे देवि! जो राजा भक्तिपूर्वक अष्टाष्टक पूजन कराता है, वह चार सागरों तक व्याप्त पृथ्वी पर शासन करता है, इसमें सन्देह नहीं।
हे कुलेश्वरि! विधिविधान का शाता साधक अपने अभीष्ट फल को पाने के लिये श्रीकण्ठादि ५० मिथुनों की पूर्वोक्त विधि से प्रौढान्त उल्लास से युक्त रूप में कृपणता से रहित होकर पूजा करे।
सन्तुष्ट होकर वे साधक को इच्छित फल देते हैं और हे प्रिये! सर्वत्र देववत् उसकी पूजा होती है। ब्रह्मादि देवताओं से संस्तुत होकर हे देवि! वह आपके लोक में निवास करता है।
श्रीकण्ठादि मिथुनों के समान केशवादि, गणेशादि और कामादि मिधुनों की पूजा करने से वैसा ही फल निश्चित रूप से मिलता है।
हे प्रिये! प्रति मास, प्रति वर्ष या अपने जन्मदिवस पर जो डाकिन्यादि की पूजा पूर्वोक्त विधि से यथाशक्ति करता है और प्रौढान्त उल्लास तक उन्हें सन्तुष्ट करता है, उससे हे देवि! सभी देवता प्रसन्न होते हैं और वह सभी उपद्रवों से रहित होकर सभी ऐश्वयों से युक्त होता है। इस लोक में सभी से वन्दित होकर वह सौ वर्षों तक जीवित रहता है और मृत्यु होने पर आपके लोक को प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं।
हे प्रिये! पूर्वोक्त विधि से नव शक्तियों से युक्त हो निर्विकल्प (शुद्ध) चित्त से जो 'दूतीयाग' करता है, वह प्रति वर्ष ६४ पौठों के अर्चन का फल पाता है। उसे आज्ञासिद्धि (वासिद्धि) मिलती है और देवता उस पर प्रसन्न होते हैं।
इच्छा, ज्ञान एवं क्रियात्मिका रूप 'त्रिकपूजा' को जो आगमोक्त विधि से करता है और पूर्ववत् विधान से यथाशक्ति हव्य पदार्थों द्वारा देवताओं को जो यथाविभवविस्तार सहित सन्तुष्ट करता है, इस प्रकार, हे देवेशि! त्रिक पूजा से सन्तुष्ट देवता साधक को अभीष्ट प्रदान करते हैं और उसकी सभी कामनाएँ पूरी होती हैं, इसमें सन्देह नहीं।
उक्त देवताओं की पूजा विशेष उत्सव दिनों में जो शास्त्रविधि से करता है, वह हम दोनों का प्रिय होता है।
जो कौलिक समर्थ होकर भी मोहवश विशेष दिनों में श्रीचक्रपूजन को नहीं करता, बह योगिनियों का पशु बनता है।
कुलपूजा के बिना चक्र में किसी को भी अधिकार नहीं होता। क्योंकि जो नियमित रूप से कुलपूजा करता है, वही कौलिक है।
यन्त्र के बिना पूजा करने से देवता प्रसन्न नहीं होते। क्योंकि जो नियमित रूप से कुल पूजा करता है, वह कौलिक है। हे कुलेशि! इस प्रकार वह योगिनी एवं वीर के सम्मिलन से सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार नीच भी यदि एक बार भक्ति से कुलार्चन करता है, तो वह सद्‌गति को प्राप्त करता है। फिर द्विजाति के लोगों की बात ही क्या है।
अतः प्रयत्नपूर्वक (सुख दुःखादि) सब दशाओं में सदा कुलपूजा करनी चाहिये क्योंकि इससे अभीष्ट फल मिलता है।
कुलपूजा से अधिक न कोई यज्ञ है, न कोई व्रत है, न तीर्थ है और न तो कुलपूजा से अधिक कोई तप ही है।
कुलपूजा से अधिक न कोई दान है, न क्रिया है, न ज्ञान है और न सुख है। कुलपूजा से अधिक न कोई धर्म है, न फल है, न ध्यान है और न तो कुलपूजा से अधिक कोई तेज ही है।
कुलपूजा से अधिक न कोई योग है, न गति है, न भाग्य है तथा कुलपूजा से अधिक कोई भी अर्चना नहीं है।
हे कुलनायिके! मैं आपसे दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि संसार में कुछ भी कुलपूजा से अधिक नहीं है, कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं। अधिक कहने से क्या लाभ, हे पार्वती! रहस्य की बात सुनिए!
वेद एवं शास्त्रोक्त मार्ग से जो कुलपूजा करता है, उसी के समीप आप मुझे स्थित समझिये। हे भामिनि! अन्य कहीं भी मैं नहीं रहता। यह सत्य है यह सत्य है यह सर्वथा सत्य है, इसमें सन्देह नहीं।
हे प्रिये! आकाश, भूमि, दिशाओं, जल, पर्वत, वन आदि सभी स्थानों में विचरण करने वाले सहस्र कोटि योगिनियों और उतने ही भैरवों की नियुक्ति हे देवि! मैंने कुल के संरक्षण के लिये की है।
हे पार्वति! ये सब देवता प्रतिदिन प्रसन्नमुख हो अपने अपने पूजन की लिप्सा एवं आकांक्षा से साधकों को ही देखा करते हैं।
अतः पूजित न होने पर ये विघ्न प्रदान करते हैं और सुपूजित होने पर ये साधक का पालन करते हैं। अपूजित होने पर ये भक्तिहीन, दुराचारी, धर्म को प्रकट करने वाले लोगों का ये नाश करते हैं और पूजित होने पर गुरु भक्त, सदाचारी, धर्म को गुप्त रखने वालों का पालन करते हैं।
अतः हे प्रिये! जो गूढ़ श्रीचक्र में योगिनियों और भैरवों का स्मरण नहीं करता है, वह योगिनियों का पशु बनता है। अतः श्रीचक्र के मध्य सभी देवताओं का स्मरण करे । क्योंकि हे देवेशि! वे साधकों पर अनुग्रह करती है, इसमें सन्देह नहीं।
हे देवि! 'अनुग्रह' को यथाक्रम बताऊँगा, सुनिए! अपने ऊपर अनुग्रह के लिये या दूसरे पर श्रेष्ठ अनुग्रह के लिये पवित्र द्रव्यों से युक्त चक्रपूजा के सहित सभी को दक्षिणा देकर अलग अलग होमपात्र प्रदान करे और समस्त आभूषणों से सजी हुई वर्ण मातृका स्थित शक्तियों की पूजा करे। स्वयं हर्षानन्द से युक्त रहे और अलग अलग सब प्रसन्न रहें।
भक्तिपूर्वक गन्ध पुष्पादि से गणेश्वर का सम्यक् रूप से पूजन कर खीर, घी, चावल से युक्त नैवेद्य प्रदान करे। पूजन का मन्त्र इस प्रकार है - हसखफ्रें हसौं डां डीं डमलवरयूं श्रीपादुकां हसौं हसखफ्रें।
हे प्रिये! मन में अभीष्ट सङ्कल्प कर गन्ध, पुष्पादि और मधुरत्रय से अलग अलग सम्यक् रूप से अर्चन एवं पूजन कर हे कमलानने! इच्छित कामनाओं की पूर्ति के लिये प्रार्थना करे। इससे साधक की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं।
हे प्रिये! १. अपनी और दूसरे की रक्षा के लिये, २. रोगों के नाश के लिये, ३. पुत्र-प्राप्ति के लिये, ४. वश्य के लिये, ५. मङ्गल (कल्याण) के लिये एवं ६. धर्म, काम तथा अर्थ की सिद्धि के लिए हे देवि! एक सप्ताह या चौदह दिनों तक पूजन करे। अथवा इक्कीस दिनों में अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।
चौंसठ देवताओं के सहित और कुलाष्टक से युक्त मण्डल में अलग अलग वस्त्रभूषा एवं भूषणादि दक्षिणा देकर प्रयत्नपूर्वक पूजन करने से अनेक प्रकार की इच्छाओं की सिद्धि होती है। अपनी सिद्धि की इच्छा हो, तो धन की कृपणता न करे।
इस प्रकार हे वरानने! अनुग्रह षट्‌क कहा गया है। साधकों को अपनी इष्ट सिद्धि के लिये प्रयत्नपूर्वक अर्चन करना चाहिये।
ध्यान कर इन डाकिनी आदि की पूजा करे। पूजन कर चुकने पर सर्वसिद्धि के लिये सप्तमी देवी की पूजा करे।
शक्तिदेहसमुत्पन्नं शक्तिनिर्माल्यभोजने । स्ववर्गेण समायुक्ता दत्तनिर्माल्यं प्रतिगृहण प्रतिगृष्ण स्वाहा ।। इस मन्त्र से निर्माल्य प्रदान करे।
सर्वमुख वाली, वित्तजा (समृद्धि सम्पन्न) वह्नि की प्रभा वाली, हाथ में कमण्डलु, कर्तरिका (कैची), वर और अभय मुद्रा धारण करने वाली डाकिनी देवी का ध्यान करना चाहिए।
उलूक के मुख वाली नीले वर्ण के सदृश हाथों में खड्ग, तलवार से युक्त तथा समस्त अलङ्कारों से विभूषित राकिणीदेवी का ध्यान करना चाहिए।
श्री कपाल से आढ्य, पाश एवं अंकुश धारण करने वाली, सती, पाटल के पुष्प के सदृश समस्त अलङ्कारों से विभूषित लाकिनी देवी का ध्यान करना चाहिए।
घोड़े के मुख वाली, माणिक्य के सदृश प्रभा वाली, तीन मुखों वाली, मुण्डों से संयुक्त सिद्धि प्रदान करने वाली तथा समस्त शोभा से सम्पन्न काकिनी देवी का ध्यान करना चाहिए।
अञ्जन के समान वर्ण वाली, मार्जारी (बिल्ली) के मुख वाली, सुशोभन विग्रह वाली, कुलिश (फावड़े) और दण्ड धारण करने वाली तथा मन्द हास से युक्त शाकिनी देवी का ध्यान करना चाहिए।
ऋक्ष के मुख वाली, नीले बादल के सदृश विग्रह बाल्ली, हाथों में कपाल एवं शूल (त्रिशूल) से युक्त और तलवार (एवं अभय मुद्रा) से सुशोभित हाकिनी का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार एक, दो, तीन, चार, पाँच एवं छः मुखों वाली तथा 'शीघ्र' अभय प्रदान करने वाली हाकिनी देवी का ध्यान करना चाहिए।
हे प्रिये! इस प्रकार मैंने आपसे विषय में संक्षेप से कहा है। अब हे कुलेशानि! आप और क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें