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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 93
दक्षिणाञ्च पृथग् दद्याद्वस्त्र भूषाङ्‌गुरीयकम् । कुलाष्टकसमायुक्तं चतुःषष्टिसमन्वितम् ॥ अर्चितञ्च प्रयलेन सिद्धिर्भवत्यनेकशः । वित्तशाम्यं न कुर्वीत यदीच्छेत् सिद्धिमात्मनः ॥
चौंसठ देवताओं के सहित और कुलाष्टक से युक्त मण्डल में अलग अलग वस्त्रभूषा एवं भूषणादि दक्षिणा देकर प्रयत्नपूर्वक पूजन करने से अनेक प्रकार की इच्छाओं की सिद्धि होती है। अपनी सिद्धि की इच्छा हो, तो धन की कृपणता न करे।
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