मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 16
यत्रैकाम्नायतत्त्वज्ञः कुलाचार्यः कुलेश्वरि । कौलिकास्त्रिचतुः पञ्च शक्तयश्च तथा प्रिये ॥ पृथग्वा पूजयेद्देवि मिथुनाकारतोऽपि वा । गन्धपुष्पाक्षताद्यैस्तु देवेशि समलङ्कृताः । भक्ष्यभोज्यादिपिशितैः पदार्थः षड्रसान्वितैः ॥
हे कुलेश्वरि! जहाँ (पश्चाम्नायों में से) एक आम्नायतत्त्व का ज्ञाता एक कुलाचार्य हो और तीन, चार या पाँच कौलिक तथा शक्तियाँ हों, वहाँ हे देवि! उनकी अलग अलग वा मिचुनाकाररूप में गन्धाक्षत पुष्यादि से पूजा कर हे देवेशि! उन्हें छः रसों से मुक्त भक्ष्य-भोज्य मांसादि पदार्थों से सन्तुष्ट करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें