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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 72
दूतीयागन्तु यः कुर्यात् पूर्वोक्तविधिना प्रिये । निर्विकल्पेन चित्तेन नवशक्तिसमन्वितः ॥ वर्षे वर्षे चतुःषष्टिपीठार्चनफलं लभेत् । आज्ञासिद्धिर्भवेत्तस्य देवताप्रीतिमाप्नुयात् ॥
हे प्रिये! पूर्वोक्त विधि से नव शक्तियों से युक्त हो निर्विकल्प (शुद्ध) चित्त से जो 'दूतीयाग' करता है, वह प्रति वर्ष ६४ पौठों के अर्चन का फल पाता है। उसे आज्ञासिद्धि (वासिद्धि) मिलती है और देवता उस पर प्रसन्न होते हैं।
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