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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 91
सङ्कल्प्य मनसोऽभीष्टं मधुरत्रितयः प्रिये ॥ गन्धपुष्यादिभिः सम्यगर्चयित्वा पृथक् पृथक् । पूजयित्वेप्सितान् कामान् प्रार्थयेत् कमलानने ॥ ईप्सितानि च सर्वाणि साधको लभते वरम् ।
हे प्रिये! मन में अभीष्ट सङ्कल्प कर गन्ध, पुष्पादि और मधुरत्रय से अलग अलग सम्यक् रूप से अर्चन एवं पूजन कर हे कमलानने! इच्छित कामनाओं की पूर्ति के लिये प्रार्थना करे। इससे साधक की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं।
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