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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 32
भृगुवारे कुलेशानि कान्तामारूढयौवनाम् । सर्वलक्षणसम्पन्नामनुकूलां मनोरमाम्‌ ॥ कुलाकुलाष्टकां देवि निमन्त्र्याहूय पुष्पिणीम् । अध्यङ्गस्नानशुद्धाङ्गीमासने चोपवेशयेत् ॥
शुक्रवार में हे कुलेशानि! सर्वलक्षण-सम्पन्ना, अनुकूल एवं मनोरमा, मन्दहासा, पुष्पिणी, युवा, कुलाष्टक से युक्त कुलस्त्री को सादर निमन्त्रितकर शुद्धोदक से स्नान द्वारा शुद्धदेह कराकर आसन पर बैठाये एवं विधि विधान से गन्ध, पुष्प एवं वस्त्रादि से उसे सजाए। तदनन्तर साधक अपने को भी, हे कुलेश्वरि! गन्धपुष्पादि से अलंकृत करे।
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