पश्यदेवंविधं चक्रं यो भक्त्याष्टाष्टकं प्रिये ।
यज्ञदानतपस्तीर्थव्रतकोटिफलं लभेत् ॥
हे प्रिये! इस प्रकार के अष्टाष्टक चक्र का जो भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह करोड़ों यज्ञ, दान, तप, तीर्थ एवं व्रत का फल पाता है।
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