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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 42
प्रौढान्तोल्लासयुक्तानि कुर्वीत मिथुनानि चः । एवं कृते न सन्देहस्तुष्टा मिथुनदेवताः । अनुगृह्णन्ति तं देवि प्रयच्छन्ति मनोरथम् ॥
फिर उन्हें 'प्रौढान्त' उल्लास से युक्त मिथुन रूप में ध्यान करे। ऐसा करने से मिथुन देवता सन्तुष्ट होकर साधक पर अनुग्रह करते हैं और हे देवि! उसकी मनोकामना पूरी करते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
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