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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 46
कुलदीपान् प्रदर्थ्याथ शिवाय गुरुरूपिणे । मत्स्यमांसादि विधिवद्भक्ष्य भोज्यसमन्वितम् ॥ अर्घ्य निवेद्य तच्छेषं स्वयं भक्त्या पिबेत् प्रिये । यौवनोल्लाससहितो निर्विकारेण चेतसा ॥
उसके बाद कुलदीपों से नीराजन कर गुरुरूप शिव को मत्स्य-मांसादि भक्ष्य-भोज्यादि सहित अर्घ्य निवेदित करे और स्वयं उनके प्रसाद को शक्ति के साथ यौवनोल्लास से युक्त होकर निर्विकार चित्त से भक्तिपूर्वक पान करे।
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