उसके बाद कुलदीपों से नीराजन कर गुरुरूप शिव को मत्स्य-मांसादि भक्ष्य-भोज्यादि सहित अर्घ्य निवेदित करे और स्वयं उनके प्रसाद को शक्ति के साथ यौवनोल्लास से युक्त होकर निर्विकार चित्त से भक्तिपूर्वक पान करे।
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