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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 57
प्रसुप्ते जीवलोके तु मुदितात्मा महानिशि । पूर्वार्धनोक्त विधिना सर्वद्रव्यसमन्वितः ॥ आज्येनानामिकास्थूलवत्ति प्रज्वाल्य पार्वति । पञ्चवर्णरजश्चित्रवसुपत्रसरोरुहे ॥ मधुपूर्ण च कलसे कांस्यपात्रे मनोहरे । दीपं संस्थाप्य पुरत उत्तराभिमुखस्थितः ॥
फिर जीव लोक के सो जाने पर आनन्दपूर्वक महानिशा में पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर हे पार्वति! घृत की एक मोटी बत्ती जलाकर पांच रंगों के चूर्ण से चित्रित अष्टदल कमल बनाये। उस पर कांसे का सुन्दर कलश मधु से भर कर स्थापित करे। कलश पर उत्तराभिमुख घृत का दीपक अपने सामने जला कर स्थापित करे।
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