नीचोऽपि वा सकृद्भक्त्या कारयेद् यः कुलार्चनम् ।
स सद्गतिमवाप्नोति किमुतान्ये द्विजातयः ॥
इस प्रकार नीच भी यदि एक बार भक्ति से कुलार्चन करता है, तो वह सद्गति को प्राप्त करता है। फिर द्विजाति के लोगों की बात ही क्या है।
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