इच्छा, ज्ञान एवं क्रियात्मिका रूप 'त्रिकपूजा' को जो आगमोक्त विधि से करता है और पूर्ववत् विधान से यथाशक्ति हव्य पदार्थों द्वारा देवताओं को जो यथाविभवविस्तार सहित सन्तुष्ट करता है, इस प्रकार, हे देवेशि! त्रिक पूजा से सन्तुष्ट देवता साधक को अभीष्ट प्रदान करते हैं और उसकी सभी कामनाएँ पूरी होती हैं, इसमें सन्देह नहीं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।