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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 68
श्रीकण्ठादीनि पञ्चाशन्मिधुनानि समर्चयेत् । पूर्वोक्तेन विधानेन कुलेश्वरि विधानवित् ॥ स्वकार्यफलसिद्ध्यर्थं वित्तशाम्यविवर्जितः । प्रौढान्तोल्लासयुक्तानि मिधुनानि समर्चयेत् ॥
हे कुलेश्वरि! विधिविधान का शाता साधक अपने अभीष्ट फल को पाने के लिये श्रीकण्ठादि ५० मिथुनों की पूर्वोक्त विधि से प्रौढान्त उल्लास से युक्त रूप में कृपणता से रहित होकर पूजा करे।
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