हे कुलेश्वरि! विधिविधान का शाता साधक अपने अभीष्ट फल को पाने के लिये श्रीकण्ठादि ५० मिथुनों की पूर्वोक्त विधि से प्रौढान्त उल्लास से युक्त रूप में कृपणता से रहित होकर पूजा करे।
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