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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 92
आत्मनश्च परस्यापि रक्षार्थं पूजयेत् प्रिये ॥ रोगाणां नाशनार्थञ्च यथात्र पुत्रसिद्धये । वश्यार्थं मङ्गलार्थञ्च धर्मकर्मार्थसिद्धये ॥ सप्ताहं पूजयेद्देवि चतुर्दशदिनानि च । एकविंशदिनान्यत्र लभते चेप्सितं फलम् ॥
हे प्रिये! १. अपनी और दूसरे की रक्षा के लिये, २. रोगों के नाश के लिये, ३. पुत्र-प्राप्ति के लिये, ४. वश्य के लिये, ५. मङ्गल (कल्याण) के लिये एवं ६. धर्म, काम तथा अर्थ की सिद्धि के लिए हे देवि! एक सप्ताह या चौदह दिनों तक पूजन करे। अथवा इक्कीस दिनों में अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।
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