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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 87
अपूजितास्तु विघ्नन्ति पालयन्ति सुपूजिताः । गुरुभक्तान् सदाचारान् गुह्यधर्मान् सदाशिवान् ॥ भक्तिहीनान् दुराचारान् नाशयन्ति प्रकाशकान् । श्रीचक्रे संस्मरेत्तस्माद् योगिनीभैरवान् प्रिये ॥
अतः पूजित न होने पर ये विघ्न प्रदान करते हैं और सुपूजित होने पर ये साधक का पालन करते हैं। अपूजित होने पर ये भक्तिहीन, दुराचारी, धर्म को प्रकट करने वाले लोगों का ये नाश करते हैं और पूजित होने पर गुरु भक्त, सदाचारी, धर्म को गुप्त रखने वालों का पालन करते हैं।
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