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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 50
माध्याहे चार्चयेद्देवं सायाले चार्चयेत् प्रिये । स तु तत्फलमाप्नोति योगिनीनां प्रियो भवेत् ॥
हे प्रिये! इसी क्रम से मध्याह्न या सायाह्न में भी (सूर्य) पूजा की जा सकती है। यह तीनों सन्ध्याओं की पूजा भी वही फल देती है और साधक योगिनियों का प्रिय हो जाता है।
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