अष्टाष्टकार्चनं कुर्यात् शक्तश्चेदेकवासरे । अथवाष्टाष्टदिवसेष्वध द्वधष्टदिनेषु च । द्वात्रिंशद्दिवसेष्वेवं चतुःषष्टिदिनेषु च ॥
गुरुणा कारयेदेवि क्रमज्ञेनापरेण वा । क्रयज्ञश्चेत् स्वयं कुर्याद्वित्तशाम्यविवर्जितः
अहाष्टक की पूजा-यदि समर्च हो, आठ अष्टकों की पूजा एक दिन में करे। अथवा हे देवि! ८, १६, ३२ या ६४ दिनों में पूजाक्रम के ज्ञाता गुरु द्वारा पूजन कराए। यदि साधक क्रम का ज्ञाता हो, तो स्वयं ही कृपणता को छोड़कर पूजा करे।
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