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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 71
अनुग्रहन्तु यः कुर्यात् डाकिन्यादिसमर्चने । मासे मासेऽथवा वर्षे स्वजन्मदिवसे प्रिये ॥ पूर्वोक्तेन विधानेन यथाविभवविस्तरम् । प्रौढान्तोल्लासपर्यन्तं तोषयेत्तद्विधानवित् ॥ कुर्वन्त्यनुग्रहं देवि सन्तुष्टाः सर्वदेवताः । सर्वोपद्रव रहितः सर्वैश्वर्यसमन्वितः ॥ लोकेऽस्मिन् संस्तुतः सर्वैः स जीवेच्छरदां शतम् । देहान्ते समवाप्नोति तव लोकं न संशयः ॥
हे प्रिये! प्रति मास, प्रति वर्ष या अपने जन्मदिवस पर जो डाकिन्यादि की पूजा पूर्वोक्त विधि से यथाशक्ति करता है और प्रौढान्त उल्लास तक उन्हें सन्तुष्ट करता है, उससे हे देवि! सभी देवता प्रसन्न होते हैं और वह सभी उपद्रवों से रहित होकर सभी ऐश्वयों से युक्त होता है। इस लोक में सभी से वन्दित होकर वह सौ वर्षों तक जीवित रहता है और मृत्यु होने पर आपके लोक को प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं।
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