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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 51
त्रिसन्धां योऽर्चयेदेवं मासमात्रं विधानवित् । का‌ङ्क्षितां लभते सिद्धिं देववद् विचरेद् भुवि ॥
जो साधक तीनों सन्ध्याओं में एक मास तक इस प्रकार विधानानुसार पूजा करता है, वह अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर पृथ्वी पर देववत् विहार करता है।
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