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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 33
गन्धपुष्पाम्बराकल्पैरलङ्कृत्य विधानवित् । आत्मानं गन्धपुष्पाद्यैरलङ्‌कुर्यात् कुलेश्वरि ॥ आवाह्य देवतां तस्यां यजेन्यासक्रमेण च । कृत्वा क्रमार्चनं धूपदीपाश्ञ्च कुलदीपकान् ॥ प्रदर्थ्य देवताबुद्ध्या पदार्थैः षड्रसान्वितैः । मांसादिभक्ष्यभोज्याद्यैस्तोषयेद्देवि भक्तितः ॥
फिर उसमें देवता का आवाहन कर न्यासक्रम से क्रमार्चन कर धूप, कुलदीपकों को दिखाकर हे देवि! उसे देवता समझते हुये छः रसों से युक्त मांसादि भक्ष्य भोज्यादि पदार्थों से भक्तिपूर्वक सन्तुष्ट करे।
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