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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 58
दीपे सावरणां देवीं ध्यात्वा विधिवदर्चयेत् । यौवनोल्लाससहितो दीपस्थां देवतां स्मरन् ॥ अष्टोत्तरसहस्रन्तु जपेन्मन्त्रमनन्यधीः । एवं समर्चयेत् कृष्णचतुर्दश्यन्तमम्बिके ॥
दीपक की बत्ती अनामिका के समान मोटी हों उत्तर की ओर मुख कर साधक कलश के सामने बैठे एवं उक्त दीपक की ज्योति में आवरण सहित देवी का ध्यानकर विधिवत् उसकी पूजा करे। फिर यौवनोल्लास से युक्त होकर दीपस्य देवता का स्मरण करते हुए एकाग्र मन से १००८ बार जप करे।
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