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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 85
खभूमिदिग्नलगिरिवनसर्वचराः प्रिये । सहस्त्रकोटियोगिन्यस्तावन्तो भैरवा अपि । नियुक्ता हि मया देवि कुलसंरक्षणाय च ॥
हे प्रिये! आकाश, भूमि, दिशाओं, जल, पर्वत, वन आदि सभी स्थानों में विचरण करने वाले सहस्र कोटि योगिनियों और उतने ही भैरवों की नियुक्ति हे देवि! मैंने कुल के संरक्षण के लिये की है।
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