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कुलार्णव • अध्याय 10 • श्लोक 6
मादिपञ्चकमीशानि देवताप्रीतये सुधीः । यथाविधि निषेवेत तृष्णया चेत् स पातकी ॥
हे ईशानि! पञ्चमकारों का सेवन देवता की प्रसन्नता के लिए यथाविधि करना चाहिये। यदि तृष्णावश उनका सेवन कोई करता है, तो वह पापी होता है।
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