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अध्याय 5 — पञ्चमोपदेश

घेरण्ड संहिता
95 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके बाद प्राणायाम की जो विधि है, उसे मैं कहता हूँ। जिसके साधन मात्र से मनुष्य देवतुल्य हो जाता है।
पहले स्थान, तब काल, फिर मिताहार, फिर नाड़ीशुद्धि (इन सब क्रियाओं को साध लेने) के बाद प्राणायाम को साधना चाहिये।
दूर देश में, अरण्य में, राजधानी में, जनों के बीच में योग का आरम्भ न करे, इससे सिद्धि नहीं होती।
दूरदेश में विश्वास नहीं होता, अरण्य में रक्षा का अभाव होता है, नगर में करने से सार्वजनिक होता है, अत: इन तीनों स्थानों का निषेध करना चाहिये।
अच्छे स्थान में, धार्मिक राज्य में, अच्छे भोज्यादि के स्थान में, उपद्र्वरहित (शान्त) स्थान में वहाँ एक कुटी चहारदीवारी से घिरी हुई हो।
प्राचीर के अन्दर वापी, कूप, तालाब हो, न अधिक ऊंचा हो, न अधिक नीचा हो तथा कुटीर कीटादि से वर्जित हो।
तथा वहाँ कुटीर अच्छी प्रकार गोमय (गोबर) से लिप्त हो, इस प्रकार के गुप्त स्थानों में प्राणायाम अभ्यास करना चाहिये।
हेमंत, शिशिर, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं में योगारंभ नहीं करना चाहिये क्योंकि यह रोगदायक समय होता है।
वसन्त और शरद ऋतु में योग का आरंभ करना चाहिये। इससे योगी सिद्ध होता है तथा निश्चय ही रोगमुक्त होता है।
चैत्र से फाल्गुन के अन्त तक दो-दो महीनों में ऋतुएँ होती हैं। किन्तु एक-एक ऋतु का अनुभव चार-चार माहों में होता है।
वसंत चैत्र और वैशाख में ग्रीष्म ऋतु ज्येष्ठ-आघाढ़ में, वर्षा ऋतु श्रावण भाद्रपद में, शरदऋतु आश्विन, कार्तिक में, मार्गशीर्ष और पौष में हेमन्तक्रतु तथा माघ, फाल्गुन में शिशिर ऋतु में होती है।
अब मैं ऋतुओं का यथाप्रकार अनुभव बताता हूँ। माघमास से वैशाख तक वसंत का अनुभव होता है।
(इसी प्रकार) चैत्र से आषाढ़ तक ग्रीष्म का अनुभव होता है तथा आषाढ़ से आश्विन तक वर्षाऋतु का चार मास तक अनुभव होता है।
भाद्रपद से मार्गशीर्ष तक शरदऋतु का अनुभव भी चार मास तक होता है, कार्तिक से माघ तक चार मास हेमंत का अनुभव, मार्गशीर्ष से फाल्गुन तक शिशिर का अनुभव विद्वानों ने कहा है।
वसंत या शरद में योगारम्भ का आचरण करे। इसमें अनायास ही योग सिद्ध होता है, ऐसा कहा जाता है।
(आहार विषय बताते हैं) जो मिताहार के बिना ही योगारंभ का आचरण करता है, वह अनेक रोगों वाला होता है, और कोई भी योग सिद्ध नहीं होता।
(योगारंभ के समय) शाली चावल, जौ का अन्न, गेहूँ अन्न, मूँग, उड़द या चना, स्वच्छ और भूसी रहित भोजन करे।
परवल, कटहल, कंकोल, करेला, अरबी, ककड़ी, केला, गूलर, चौलाई आदि (का सेवन करे)।
आमरंभ, कच्ची गहर, केला का दण्ड और जड़, बेगन, मूली आदि औषधि योगी को खानी चाहिये।
कच्चा शाक, मौसमानुसार शाक, परवल का शाक (पत्ते), बथुआ, हिलमोचिका ये पाँच तरह के शाक प्रशंसनीय है।
शुद्ध, मधुर, स्निग्धभोजन, आधे उदर ही प्रेमपूर्वक योगारंभ समय संयमित आहार (मिताहार) किया जाता है, ऐसा विद्वानों ने कहा है।
अन्न मात्र आधा उदर ही खाये, तृतीय भाग अर्थात्‌ उदर के एक चौथाई भाग में जल पीये,तथा चौथाई भाग वायु संचरण के लिये छोड़ देना चाहिये।
कटु, खट्टा, नमक, तीखा, भुने हुए, दधि, मठ्ठा, बुरे शाक, मदिरा, छुहारा, कटहल (इनका योगारंभ के समय त्याग रखें)।
कुलथी, मसूर, पाण्डु का शाक, पेठा, शाक दण्ड, घीया, वैर, कैथ, कांटे वाली बेल व पलाश (इन्हें योगारंभ में नही सेवन करे)।
कदम्ब, जम्बीर, निम्ब, लकुच, लहशुन, विष, कमरख, प्रियाल (व्याज), हींग, शाल्मलि, गोभी, स्त्री, अग्नि इस सब पथ्य का सेवन योगारम्भ के समय वर्जित रखे।
मक्खन, घी, शक्कर, गुड़, गन्ना, पाँच प्रकारीय केले, नारिकेल, अनार, सोंफ, मुनक्का, नवनी (नोनिया), आँवला, और अम्लरस ये सब वर्जित हैं।
इलायची, चमेली, लोंग, बलकारकदवा, जामुन, जाम्बुल, हरड़, खजूर ये वस्तु योगी को भक्षण करनी चाहिये।
शीघ पकने वाली प्रिय, स्निग्ध, धातुओं की पोषक वस्तु योगी भोजन में ले।
काठिन्यपूर्ण, बुरी, पापकारिणी, बासी, अतिठण्डा, अतिगर्म भोजन योगी वर्जन करे - न करें।
प्रात: समय स्नान, उपवासादि कायाक्लेश, विधि रहित कार्य और एक समय आहार, निराहार रहना और एक प्रहर बाद खाना, ये सब नहीं करने चाहिये।
इस प्रकार विधि विधान से प्राणायाम करना चाहिये। पहले आरम्भ में दूध,घी और नित्य भोजन करना चाहिये। मध्याह्न और सायंकाल दो बार योगी को भोजन करना चाहिये।
कुशासन पर, मृगचर्म पर, व्याघ्रचर्म पर और कम्बल पर स्थल आसन पर समासीन होकर पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर नाड़ी शुद्धि करके प्राणायाम करे।
(तब चण्डकापालि ने पूछा-) हे दयानिधे! नाड़ीशुद्धि कैसे करनी चाहिये, नाड़ी शुद्धि कैसी होती है? उस सबको मैं सुनना चाहता हूँ, अतः इसे बताइये।
(उत्तर में कहते हैं-) रक्तचर्मवसादि मल से युक्त नाड़ियों में पवन नहीं जा पाता है, तब प्राणायाम की सिद्धि कैसे होती हे? और तत्वज्ञान कैसे होता है? जिससे नाड़ी शुद्धि को पहले और प्राणायाम बाद में करे। (विशेष - मलाकुलासु में कहीं-कहीं माला शब्द भी मिलता है। जिसका अर्थ 'माला की भाँति गुँथी हुई नाडियों में' होता है।)
नाड़ी सिद्धि भी दो प्रकार की समनु और निर्मनु कही गयी हैं समनु को बीज मंत्र से और निर्मनु को धौतिकर्म से करना चाहिये।
षट्कर्म साधन में धौतिकर्म पहले कह दिया है। अब समनु नाड़ी शुद्धि जैसे होती है, वह सुनो।
योगी आसन पर बैठकर पद्मासन लगाये। गुरु आदि न्यास करके जैसा गुरु ने सिखाया है, उस प्रकार प्राणायाम सिद्धि हेतु, नाड़ी शुद्धि करे।
उस वायुबीज का ध्यान करके जो धूम और तेज युक्त है, सोलह बीज को जपते हुए चन्द्र मार्ग (वामनासापुट) से वायु को खींचना चाहिये।
तथा ६४ बार कुम्भक के समय (प्राणायाम को) धारण करे। पुन: ३२ बार उच्चारण करते हुए सूर्यनाड़ी (दायें नासा पुट) से वायु का रेचन करे।
नाभिमूल से अग्नि को उठाकर भूमि तत्व सहित उस तेज का ध्यान करे। सोलह बार अग्निबीज 'रं' जपते हुए सूर्य नाड़ी से पवन को पूर्ण करे।
चौंसठ बार जपते हुए कुंभक से धारण करे, और बत्तीस बार से चन्द्रनाड़ी से उसका रेचन करे।
फिर नासिका के अग्रभाग में चन्द्रिका से युक्तचन्द्र का ध्यान करके 'ठं’ बीज को सोलह बार जपते हुए इड़ा से वायु पूरक करे।
चौसठ बार 'वं' बीज को जपते हुए धारण करे। (नासिका के अग्रभाग में मानो) अमृत नित्य गिरता है, उसका ध्यान करके नाड़ी धौति की भावना करनी चाहिये। तथा बत्तीस बार लकार बीज (ल) की भावना करते (जपते) रेचन करे।
इस प्रकार नाड़ी शुद्धि करके नाड़ी का शोधन करना चाहिये। तथा दृढ़ता से आसन लगाकर प्राणायाम करना चाहिये।
सहित, सूर्यभेद, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा, केवली ये आठ प्रकारीय कुंभक प्राणायाम होते हैं।
सहित कुंभक दो प्रकार का कहा गया है - सगर्भ और निर्गर्भ। सगर्भ को बीजमंत्र का उच्चारण करते हुए और निगर्भ को बीज का उच्चारण न करते हुए प्राणायाम करे।
सगर्भ प्राणायाम मैं प्रथम कहता हूँ। सुखासन में बैठकर प्राइमुख या उत्तर मुख होकर रजोगुण रूप रक्तवर्ण और अ वर्ण स्वर का ध्यान करे।
सोलहबार जपते हुए वामनासा से वायु पूरित करे, और पूरक के अंत में कुंभक के पहले (अर्थात्‌ वायु खींचने के बाद) उड्डीयान करना चाहिये।
पुन: उकार स्वरूप कृष्णवर्ण सत्वगुणरूप विष्णु का ध्यान करके चौंसठ बार जप से कुंभक से धारण करे।
पुनः मकार स्वरूप शुक्लवर्ण रूप तमोमय शिव का ध्यान करके बत्तीस बार जप विधि से रेचन करना चाहिये।
फिर दायें छिद्र से पूरक करके कुंभक से धारण करे, पुन: उसी बीज से वामछिद्र से रेचन करे।
अनुलोम विलोम से बार-बार इसे साधना चाहिये। पूरकान्त और कुम्भकान्त में दोनों नासापुटों को कनिष्ठिका, अनामिका और अंगुष्ठ इन्हीं तीनों से तथा तर्जनी और मध्यमा के बिना ही (प्राणायाम करे)।
निगर्भ प्राणायाम बिना बीज के ही हो जाता है। इस प्रकार पूरक, कुंभक और रेचक कुल एक से लेकर सौ तक मात्रायें होती हैं।
उत्तम प्राणायाम बीस मात्रा वाला, मध्यम सोलह मात्रा वाला तथा अधम बारह मात्रा वाला इस प्रकार तीन प्राणायाम हैं।
अधम प्राणायाम से घर्म (गर्मी) होती है, मध्यम से मेरुदण्ड में कंपन और उत्तम से भूमि त्याग (भूमि से ऊपर उठना संभव) होता है। इस प्रकार (प्राणायाम का) सिद्धि लक्षण है।
प्राणायाम से खेचरत्व प्राप्त होता है, प्राणायाम से रोगनाश होता है, प्राणायाम से बोधशक्ति प्राप्त होती है, प्राणायाम से ज्ञान प्राप्ति और चित्त में आनंद होता है। प्राणायाम करने वाला मनुष्य अवश्य सुखी होता है।
(सूर्यभेदक कुंभक विधि कहते हैं-) सहित कुंभक (ऊपर) बताया गया है। अब सूर्य भेदक प्राणायाम को सुनो - प्रथम दायें छिद्र से पूरक को यथा शक्ति करे।
पुनः यत्नपूर्वक जालंधर मुद्रा से कुंभक धारण करे। जब तक कि नखकेशों से पसीना न आये, तब तक कुंभक को करे।
प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान ये पंचप्राण हैं। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय ये पाँच पवन होते हैं।
हृदय में नित्य प्राण गमन करता है, गुदा में अपान, नाभि में समान, कंठमध्य में उदानवायु (गमन करता है)।
व्यानवायु पूर्ण शरीर में व्यापता है। ये पंच प्राणादिवायु प्रमुख हैं और नागादि पाँच वायु गौण हैं।
उनमें पाँच वायुओं के स्थान में बताता हूँ। डकार में नाग वायु कही है, आँख उन्मीलन में कूर्म कही है, कृकल छींकने में, जंभाई में देवदत्त पवन और सर्वव्यापक धनंजय पवन मरने पर भी नहीं छोड़ती है।
नाग चैतन्य को ग्रहण करती है, कूर्म निमेष को, क्षुधा और प्यास को कृकल, तथा जृम्भण को देवदत्त पवन ग्रहण करती है, धनंजय पवन एक क्षण को भी शरीर से बाहर नहीं होती है।
वे सारे सूर्यभेदक प्राणायाम नाभि से उठाकर धैर्य से वेगपूर्वक वामनासापुट से रेचन करे।
पुनः दायें नासापुट से श्वास खींचकर यथाविधि कुंभक करके क्रम से रेचन करके बार-बार साधन करे।
सूर्यभेदक कुंभक जरामृत्यु का विनाशक है, यह कुंडलिनी शक्ति और जठराग्नि को बढ़ाने वाला है। इस प्रकार यह उत्तम सूर्यभेदक प्राणायाम कहा गया है।
(उज्जायी कुंभक विधि बताते हैं-) नासापुटों से वायु खींचकर वायु को मुख से धारण करे। हृदय और गले के पवन को खींचकर मुख के मध्य में धारण करे।
पुनः मुख धोकर वन्दन करके जालंधर को करे। फिर कुंभक को यथाशक्ति धारण करें, पुनः रेचन करे।
उज्जायी कुंभक को करके सब कार्यो को साधना चाहिये इससे कफरोग, वायु और अजीर्ण नहीं होता।
आमवात, क्षय, कास, ज्वर, प्लीहा भी (उज्जायी कुंभक को साधने से) नहीं होता। मनुष्य जरामृत्युविनाशक उज्जायी प्राणायाम को साधे।
(उज्जायी कुंभक की विधि बताते हैं-) जिह्वा से धीरे-धीरे वायु को खींचकर उदर में भरे। पुन: क्षणभर कुंभक करके नासाछिद्रों से रेचन करे।
यह शीतली कुंभक योगी को शुभदायक है, अत: इसे साधना चाहिये। क्योंकि अजीर्ण, कफ और पित्त उसे नहीं होता है।
जिस प्रकार लुहारों की धौंकनी क्रम से वायु को खींचती है, वैसे ही धीरे-धीरे वायु को नासाछिद्रों से भरना चाहिये।
इस प्रकार बीस बार करके कुंभक करना चाहिये। तब अंत में पूर्वोक्त विधि से वायु को चलाये (निकालना) चाहिये।
इस भस्रिका कुंभक को बुद्धिमान तीन बार साधे। इससे न रोग और न क्लेश होता है तथा दिन-दिन आरोग्य प्राप्त होता है।
(भ्रामरी कुंभक विधि बताते हैं-) आधी रात्रि होने पर योगी प्राणियों के शब्दों के पूर्ण शान्त होने पर हाथों से कान बन्दकर पूरक और कुंभक करे।
तब दायें कान से आंतरिक नाद को सुने। प्रथम तो झींगुरों का सा नाद और उसके परे वंशीनाद (सुनायी देगा)।
उसके बाद मेघनाद, फिर झर (झांझ) का नाद, फिर भ्रमरी नाद, फिर घंटा और काँसे के पात्र का नाद, पुनः तुरइनाद, भेरी-मृदंग और नगाड़ों का नाद सुनायी देगा।
इस प्रकार अनेक प्रकार का नाद नित्य अभ्यास से सुनाई देता है। यह नाद अनाहत रूप से सुनायी देता है और उस शब्द की अद्भुत ध्वनि होती है।
उसी ध्वनि के अन्तर्गत ज्योति है और उसी ज्योति के अन्तर्गत मन है। वह मन उस परमपद विष्णु में मिल जाये तो यही भ्रामरी सिद्धि समाधि सिद्धि को प्राप्त हो जाती है।
जप से आठ गुना ध्यान, ध्यान से आठगुना तप, तप से आठगुना गान और गान से गुना (अधिक) अन्य कोई नही है।
(मूर्छा कुम्भक विधि बताते हैं-) सुख से कुम्भक करके और मन को भ्रुवों के बीच में सब विषयों से हटाकर मन की मूर्छा को ही मूर्च्छा कहा है। इस मन के आत्मा में योग से निश्चय आनन्द होता है।
(केवली कुम्भक की विधि-) हं" बीज से वायु बाहर जाती है, “स' कार से वायु प्रवेश करती है। इक्कीस हजार छ:सौ दिन रात्रि में सर्वदा जीव अजपा गायत्री को जपता है।
मूलाधार में, हृदय कमल में और नासिका छिद्रों की दोनों नाड़ियों में 'हं' बीज के जप का आवागमन होता है।
छह अंगुलि के बराबर शारीरिक कर्म में वायु का स्वभाव होता है, देह से बाहर निकलने पर बारह अंगुलि होता है।
गायन में १६ अंगुलि, भोजन में २० अंगुलि, मार्ग में चलने में २४ अंगुलि, नीद में ३० अंगुलि, रति में ३६ अंगुलि और परिश्रम में और अधिक होता है।
स्वाभाविक रूप में इसकी गति कम होती है तो आयु बढ़ती है। यदि अन्तर्गत वायु अधिक चलती है, तो आयु का क्षय होता है।
इसलिये प्राण में स्थित देह में मरण नहीं होता हे, वायु से शरीर सम्बध में केवल कुम्भक होता है।
जब तक जीये, तक तक केवल अजपा को संख्यावत जपे। अब तक जो संख्या (मात्रा) बतायी हे, उस प्रकार विभ्रम और केवली करने पर (सिद्धि प्राप्त होती है)।
अतएव मनुष्यों को केवल कुम्भक करना चाहिये। अजपा को दुगना करके केवली करने से मन प्रसन्न होता है।
नासाछिद्रों से वायु को खींचकर केवल कुम्भक करना चाहिये। प्रथम दिन ६४ बार (इस प्राणायाम को) धारण करे।
केवल कुम्भक प्रतिदिन आठ बार प्रहर-प्रहर में करना चाहिये अथवा पाँच बार (प्राणायाम साधना) करे, जैसा मैं तुमसे बताता हूँ।
प्रात: दोपहर सायं, और मध्यरात्रि के चतुर्थ प्रहर में दिन-प्रतिदिन तीनों संध्याओं में समान संख्या में (इसे करना चाहिये)।
दिन में एक बार और पाँच बार वृद्धि करते हुए यह अजपा संख्या जब तक सिद्धि हो (तब तक करे)।
केवली प्राणायाम को (सिद्ध करके) योगी योगवित्‌ होता है। इस केवली कुम्भक के सिद्ध होने पर भूतल पर क्या नहीं सिद्ध होता?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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