मलाकुलासु नाड़ीषु मारुतो नैव गच्छति ।
प्राणायाम: कथं सिध्येत्तत्त्वज्ञानं कथं भवेत् ।
तस्मादादौ नाडीशुद्धि प्राणायामं ततोऽ भ्यसेत् ॥
(उत्तर में कहते हैं-) रक्तचर्मवसादि मल से युक्त नाड़ियों में पवन नहीं जा पाता है, तब प्राणायाम की सिद्धि कैसे होती हे? और तत्वज्ञान कैसे होता है? जिससे नाड़ी शुद्धि को पहले और प्राणायाम बाद में करे।
(विशेष - मलाकुलासु में कहीं-कहीं माला शब्द भी मिलता है। जिसका अर्थ 'माला की भाँति गुँथी हुई नाडियों में' होता है।)
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