भस्तरैव लोहकाराणां यथाक्रमेण सम्भ्रमेत् ।
तथा वायुं च नासाभ्यामुभाभ्यां चालयेच्छनैः ॥
जिस प्रकार लुहारों की धौंकनी क्रम से वायु को खींचती है, वैसे ही धीरे-धीरे वायु को नासाछिद्रों से भरना चाहिये।
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