उसके बाद मेघनाद, फिर झर (झांझ) का नाद, फिर भ्रमरी नाद, फिर घंटा और काँसे के पात्र का नाद, पुनः तुरइनाद, भेरी-मृदंग और नगाड़ों का नाद सुनायी देगा।
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