ध्वनेरन्तर्गतं ज्योति ज्योतिरन्तर्गतं मनः ।
तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ।
एवं च भ्रामरीसिद्धिः समाधिसिद्धिमाप्नुयात् ॥
उसी ध्वनि के अन्तर्गत ज्योति है और उसी ज्योति के अन्तर्गत मन है। वह मन उस परमपद विष्णु में मिल जाये तो यही भ्रामरी सिद्धि समाधि सिद्धि को प्राप्त हो जाती है।
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