चतुःषष्ट्या च मात्रया कुम्भकेनैव धारयेत् ।
द्वात्रिशन्मात्रया वायुं शशिनाङ्या च रेचयेत् ॥
चौंसठ बार जपते हुए कुंभक से धारण करे, और बत्तीस बार से चन्द्रनाड़ी से उसका रेचन करे।
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