नाभिमूलाह्ह्निमुत्थाप्य ध्यायेत्तेजोऽवनीयुतम् ।
वह्विबीजषोडशेन सूर्यनाड्या च पूरयेत् ॥
नाभिमूल से अग्नि को उठाकर भूमि तत्व सहित उस तेज का ध्यान करे। सोलह बार अग्निबीज 'रं' जपते हुए सूर्य नाड़ी से पवन को पूर्ण करे।
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