हङ्कारेण बहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः ।
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकरविशतिः ।
अजपां नाम गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥
(केवली कुम्भक की विधि-) हं" बीज से वायु बाहर जाती है, “स' कार से वायु प्रवेश करती है। इक्कीस हजार छ:सौ दिन रात्रि में सर्वदा जीव अजपा गायत्री को जपता है।
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