मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
घेरण्ड संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 43
चतुःषष्ट्या मात्रया च वं बीजेनैव धारयेत्‌ । अमृतं प्लावितं ध्यात्वा नाड़ीधौतं विभावयेत्‌ । लकारेण द्वात्रिशेन दृढं भाव्यं विरेचयेत्‌ ॥
चौसठ बार 'वं' बीज को जपते हुए धारण करे। (नासिका के अग्रभाग में मानो) अमृत नित्य गिरता है, उसका ध्यान करके नाड़ी धौति की भावना करनी चाहिये। तथा बत्तीस बार लकार बीज (ल) की भावना करते (जपते) रेचन करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
घेरण्ड संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

घेरण्ड संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें