वापीकूपतडागं च प््राचीरंमध्यवर्ति च ।
नात्युच्चं नातिनिम्नं च कुटीरं कीटवर्जितम् ॥
प्राचीर के अन्दर वापी, कूप, तालाब हो, न अधिक ऊंचा हो, न अधिक नीचा हो तथा कुटीर कीटादि से वर्जित हो।
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