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घेरण्ड संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 82
सुखेन कुम्भकं कृत्वा मनश्च भ्रुवोरन्तरम्‌ । सन्त्यज्य विषयान्‌ सर्वान्‌ मनोमूर्च्छा सुखप्रदा । आत्मनि मनसो योगादानन्दो जायते ध्रुवम्‌ ॥
(मूर्छा कुम्भक विधि बताते हैं-) सुख से कुम्भक करके और मन को भ्रुवों के बीच में सब विषयों से हटाकर मन की मूर्छा को ही मूर्च्छा कहा है। इस मन के आत्मा में योग से निश्चय आनन्द होता है।
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