चतुःषष्ट्या मात्रया च कुम्भकेनैव धारयेत् ।
द्वात्रिंशन्मात्रया वायुं सूर्यनाड्या च रेचयेत् ॥
तथा ६४ बार कुम्भक के समय (प्राणायाम को) धारण करे। पुन: ३२ बार उच्चारण करते हुए सूर्यनाड़ी (दायें नासा पुट) से वायु का रेचन करे।
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