तेषामपि च पञ्चानां स्थानानि च वदाम्यहम् । उद्गारे नाग आख्यात: कूर्मस्तून्मीलने स्मृतः ॥
कृकलः क्षषुत्कृते ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे । न जहाति मृते क्वापि सर्वव्यापी धनञ्जयः ॥
उनमें पाँच वायुओं के स्थान में बताता हूँ। डकार में नाग वायु कही है, आँख उन्मीलन में कूर्म कही है, कृकल छींकने में, जंभाई में देवदत्त पवन और सर्वव्यापक धनंजय पवन मरने पर भी नहीं छोड़ती है।
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