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घेरण्ड संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 63
नागो गृहणाति चैतन्यं कूर्मश्चेव निमेषणम्‌ । ्षु्षं कृकलश्चैव जृम्भणं चतुर्थेन तु। भवेद्धनञ्जयाच्छब्दं क्षणमात्रं न निःसरेत्‌ ॥
नाग चैतन्य को ग्रहण करती है, कूर्म निमेष को, क्षुधा और प्यास को कृकल, तथा जृम्भण को देवदत्त पवन ग्रहण करती है, धनंजय पवन एक क्षण को भी शरीर से बाहर नहीं होती है।
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