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घेरण्ड संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 32
कुशासने मृगाजिने व्याघ्राजिने च कम्बले । स्थलासने समासीनः प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः । नाड़ीशुद्धि समासाद्य प्राणायामं समभ्यसेत्‌ ॥
कुशासन पर, मृगचर्म पर, व्याघ्रचर्म पर और कम्बल पर स्थल आसन पर समासीन होकर पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर नाड़ी शुद्धि करके प्राणायाम करे।
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