अत एव हि कर्तव्य: केवलीकुम्भको नरे: ।
केवली चाजपासडख्या द्विगुणा च मनोन्मनी ॥
अतएव मनुष्यों को केवल कुम्भक करना चाहिये। अजपा को दुगना करके केवली करने से मन प्रसन्न होता है।
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