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घेरण्ड संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 52
अनुलोमविलोमेन वारं वारं च साधयेत्‌ । पूरकान्ते कुम्भकांते धृतनासापुटद्वयम्‌ । कनिष्ठानामिकाङ्गुष्ठैः तर्जनीमध्यमे विना ।।
अनुलोम विलोम से बार-बार इसे साधना चाहिये। पूरकान्त और कुम्भकान्त में दोनों नासापुटों को कनिष्ठिका, अनामिका और अंगुष्ठ इन्हीं तीनों से तथा तर्जनी और मध्यमा के बिना ही (प्राणायाम करे)।
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