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अध्याय 68 — अथ पुरुषलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
115 श्लोक • केवल अनुवाद
उन्मान (अङ्गुलात्मक ऊँचाई), मान (भारीपन), गति (गमन), संहति (घनता), सार, वर्ण, स्नेह (स्निग्धता), स्वर (शब्द), प्रकृति, सत्त्व, अनूक (जन्मान्तरागमन), क्षेत्र ( वक्ष्यमाण दस प्रकार के पाद आदि), मृजा (पञ्चमहाभूत- मयी शरीरच्छाया) -इनको अच्छी तरह जानकर ही सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञाता पण्डित मनुष्यों के शुभाशुभ फल कह सकता है।
स्वेदरहित, कोमल तल वाले, कमलोदर के समान, सम्मिलित अंगुलियों से युत, ताम्र वर्ण के सुन्दर नख वाले, सुन्दर एड़ियों से युत, गरम, शिराओं से रहित, छिपी हुई पाँव की गाँठी वाले और कछुये के पृष्ठ के समान पाँव राजा के होते हैं।
शूर्पाकार, अस्निग्ध और पाण्डुर नख वाले तथा वक्र नाड़ियों से युत, सूखे और विरल अंगुलियों वाले पाँव दरिद्रता और दुःख देते हैं। मध्य में उत्रत पाण्डुर वर्ण के पाँव मार्ग के लिये होते हैं अर्थात् मार्ग में चलाते हैं। कषाय (कृष्ण-लोहित) पाँव वंश का नाश करते हैं। आग में पकी हुई मिट्टी के समान जिसकी पाँव की कान्ति हो, वह ब्रह्मघाती होता है। यदि पाँवतल पीले हों तो वह अगम्या ली में रत होता है।
विरल तथा मूक्ष्म रोमों में युत, गजशुण्ड के समान सुन्दर ऊरु वाले तथा पुष्ट और सन्मान जानु वाले मनुष्य राजा होते हैं एवं कुत्ते और सियार के सदृश नद्धा पाले मनुष्य धनहीन होते है।
राजाओं की जंघाओं के रोमकूपों में एक-एक रोम और पण्डित में श्रोत्रिय की जंघाओं के रोमकूपों में दो-दो रोम होते हैं। जिनके एक रोमकूप में तीन-चार आदि रोम होते हैं, वे मनुष्य निर्धन और दुःखी होते हैं।
मांसरहित जानु वाले मनुष्य का मरण प्रवास में होता है तथा छोटे जानु वाला मनुष्य भाग्यशाली, अति विस्तीर्ण जानु वाला दरिद्र, निम्न जानु वाला स्त्रीजित, मांसयुत जानु वाला राज्यभोगी और बड़े जानु वाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है।
छोटे लिंग बाला मनुष्य धनी और सन्तानरहित, स्थूल लिंग वाला निर्धन, बाँई ओर झुका हुआ लिंग वाला पुत्र तथा धन से रहित, दाहिनी ओर झुका हुआ लिंग वाला पुत्रवान, नीचे की ओर झुका हुआ लिंग वाला दरिद्र, नाड़ियों से व्याप्त लिंग वाला अल्प पुत्र वाला, स्थूल ग्रन्यियुत लिंग वाला सुखी और कोमल आदि लिंग वाला मनुष्य प्रमेह आदि रोगों से मरण पाने वाला होता है।
जिन पुरुषों का लिङ्ग चर्मकोश के द्वारा पूर्ण रूप से सुरक्षित अर्थात् आच्छादित होता है, ये लोग राजा होते हैं एवं जिनका लिङ्ग लम्बायमान तथा स्पष्टतया टेढ़ा होता है, वे लोग धनहीन होते हैं। इसी प्रकार जिनका लिङ्ग वर्तुलाकार, छोटे आकार बाला या जिनके लिङ्ग की शिराये (अग्रभाग) स्वल्प हो, वे धनवान होते हैं।
एक अण्ड वाला मनुष्य पानी में डूब कर मरण को प्राप्त करता है तथा विषम ( छोटे-बड़े) अण्ड वाला मनुष्य स्त्रीलम्पट, समान अण्ड वाला राजा, ऊपर को खींचे हुये अण्ड वाला अल्पायु और लम्बे अण्ड वाला मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रहने वाला होता है।
लाल रंग के मणि ( लिंग के अग्र भाग) वाले पुरुष धनी तथा सफेद और मलिन मणि वाले निर्धन होते हैं। जिनके मूत्रस्राव के समय शब्द हो, वे सुखी और शब्द न हो, वे निर्धन होते हैं।
जिनके दक्षिणावर्त क्रम से दो, तीन या चार मूत्र की धारा होकर गिरती हो, वे राजा होते हैं। जिनकी मूत्रधार इधर-उधर बिखरती हो, ये निर्धन होते हैं।
वेष्टित एक मूत्रधारा मनुष्य को सुन्दर तो बनाती है, किन्तु पुत्र नहीं देती है। जिनके मणि स्निग्ध, ऊँचे और सम हों, वे पुरुष धन, स्त्री और रत्नों को भोगने वाले होते हैं।
जिनके मणि के मध्य भाग विनत हों, वे कन्याओं के पिता और निर्धन होते हैं। जिनके मणि- मध्य ऊँचे हों, वे बहुत पशुओं के स्वामी होते हैं तथा जिनके मणि ही न हों, वे मनुष्य धनी होते हैं।
जिनके बस्ति (नाभि और लिङ्ग के मध्यभाग) के ऊपर का भाग मांसरहित हो, ये निर्धन और सबके लिये अप्रिय होते हैं। जिनके वीर्य में पुष्प के समान गन्ध हो, वे राजा होते हैं।
जिनके बोर्य में मछली के समान गन्ध हो, ये बहुत सन्तान वाले होते हैं। जिनका थोड़ा वीर्य होता है, वे कन्याओं के पिता होते हैं। जिनके वीर्य में मांस के समान गन्ध हो, वे अधिक भोगी होते हैं।
वीर्य में मद्य के समान गन्ध हो तो यज्ञ करने वाला, खार के तुल्य गन्ध हो तो निर्धन, शीघ्र मैथुन करने वाला दीर्घायु और देर तक मैथुन करने वाला अल्पायु होता है।
अति स्थूल स्फिक ( कुल्हा कमर का मांसपिण्ड) वाला मनुष्य निर्धन, मांसयुत कुल्हा वाला सुखी, ड्योढे कुल्हा वाला बाघ के द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने वाला और मेढक के समान कुल्हा बाला मनुष्य राजा होता है।
सिंह के समान कटि बाला मनुष्य राजा, ऊंट के समान कटि वाला निर्धन, समान ( न ऊँचा, न नीचा) उदर वाला भोगी, और पड़े या हाँड़ी के समान उदर वाला मनुष्य निर्धन होता है।
अविकल ( परिपूर्ण) पार्श्व (कटि के ऊपर का चार अंगुल भाग) वाला मनुष्य धनी, निम्न और वक्र पार्श्व वाला अभोगी एवं समान कुक्षी (उदरमध्य भाग) वाला भोगी और निम्न कुक्षी वाला अभोगी होता है।
उन्नत कुक्षी वाला मनुष्य राजा, विषम कुक्षी वाला कठोर और सर्प के उदर के समान लम्बे उदर वाला मनुष्य निर्धन एवं बहुत भोजन करने वाला होता है।
गोल, ऊँची और विस्तीर्ण नाभि वाले मनुष्य सुखी होते हैं। छोटी, अदृश्य और अनिम्न नाभि दुःखदायी होती है।
पेट की बलि के मध्य में स्थित एवं विषम नाभि शूली पर चढ़ाती और निर्धन बनाती है। वामावर्त नाभि शठ एवं दक्षिणावर्त नाभि तत्त्वज्ञानी करती है।
दोनों पार्च में आयत नाभि दीपार, ऊपर की तरफ आयत नाभि ऐश्वर्य, नीचे की तरफ आयत नाभि गायों से युक्त और कमलकोर की आकृति के समान आकृति वाली नाभि मनुष्य को राजा बनाती है।
एक वलि (उदर की रेखा) वाले मनुष्य का शत्र से मरण होता है। दो वलि वाले मनुष्य बहुत स्त्रियों को भोगने वाले होते हैं। इसी प्रकार तीन बलि वाले उपदेशक, चार वलि वाले बहुत पुत्रों से युत और वलिरहित उदर वाले मनुष्य राजा होते हैं।
विषम (छोटी-बड़ी) वलि वाले अगम्या स्त्री में गमन करने वाले तथा सीधी वलि वाले मनुष्य सुखी एवं परस्त्री से विमुख होते हैं।
पुष्ट, कोमल और दक्षिणावर्त रोमों से युक्त पार्श्व वाले मनुष्य राजा होते हैं। विपरीत लक्षणों (मांसरहित, कठोर तथा वामावर्त रोमों) से युक्त पार्श्व वाले मनुष्य निर्धन, दुःखी और दूसरे के दास होते हैं।
जिनके चूचुक ( स्तन के अग्र भाग) ऊपर की ओर खींचे न हों, वे पुरुष सुभग होते हैं। जिनके विषम (छोटे-बड़े) और लम्बे हों, वे निर्धन होते हैं तथा जिनके चूचुक कठोर, पुष्ट तथा नीचे हों, वे राजा और सुखी होते हैं।
राजाओं का हृदय ऊँचा, विस्तीर्ण और कम्प से रहित होता है। निर्धनों का हृदय विपरीत लक्षणों (नीचा, कृश, सकम्प तथा कठोर रोम) से युक्त तथा शिराओं से व्याप्त होता है।
समान (न ऊँची, न नीची) छाती वाले धनी, छोटी छाती वाले पुरुषार्थ से रहित एवं विषम छाती वाले मनुष्य निर्धन और शस्त्र से मृत्यु पाने वाले होते हैं।
विषम जत्रु (कन्धों के जोड़) वाला मनुष्य क्रूर, अस्थिसन्धियों से व्याप्त जत्रु वाला मनुष्य निर्धन तथा पर जत्र वाला परुष धनी होता है।
चपटी ग्रीवा वाला पुरुष निर्धन, सूखी हुई नाड़ियों से युत ग्रीवा वाला निर्धन, महिष के समान ग्रीवा वाला सूर और बैल के समान ग्रीवा वाला शख से मरण पाने वाला होता है।
साथ ही संख के समान ग्रीवा वाला मनुष्य राजा और लम्बी ग्रीवा वाला बहुत खाने वाला होता है। अभग्न और रोमरहित पीठ धनिक लोगों की तथा भग्न और रोमों से युत पीठ निर्धनों की होती है।
पसीने से रहित, पुष्ट, ऊँची, सुगन्धयुत, समान तथा रोमों से व्याप्त काँख धनिकों को होती है। पसीने से युत, अपुष्ट, नीची, दुर्गन्धयुत, विषम और रोमरहित काँख निर्धनों को होती है।
मांसहीन, रोमों से युत, भग्न तथा छोटे कन्ये निर्धन मनुष्यों के होते हैं तथा विस्तीर्ण, अधान और परस्पर संलग्न कन्ये सुखों और बली पुरुषों के है है।
हाथी के मुँड़ के समान वर्तुलाकार, जानुपर्यन्त लम्बे, राम तथा भोटे बाडू राजा के होते हैं। रोगों से पुत तथा छोटे बाहु निर्धन के होते हैं।
दीर्घायु वाले मनुष्यों की अंगुली लम्बी, सुभग पुरुषों की सीधी, बुद्धिमानों को पहली और दूसरों की सेवा करने वाले की अंगुली चपटी होती है।
मोटी अंगुली वाले निर्धन और बाहर को झुकी हुई अंगुली बाले शल से मृत्यु पाने वाले होते हैं। वानर के समान हाथ वाले धनी और बाप के समान हाथ, काले पापी होते हैं।
निगूर, इम और लिन्थियों से युतमजिन् हस्तमूल या पहुँचा) वाले मनुष्य राजा होते हैं। मणिन्य वाले का हाथ कट जाता है और शब्दसहित मणि- कन्यकाले निर्धन होते हैं।
निम्न हथेली बाले मनुष्य पिता के धन से विहीन, वर्तुलाकार निम्न हथेली वाले धनी तथा ऊँची हथेली बाले दानी होते हैं।
विषम हथेली वाले दुष्ट और निर्धन, लाख के समान लाल वर्ष की हथेली वाले धनों, पीली हथेली वाले अपम्या श्री में गमन करने वाले और रूखी हथेली वाले निर्धन होते हैं।
तुष के समान रेखाओं से मुठ नख वाले नपुंसक, बुरे और वर्णहीन मख चाले दूसरे के मुख को देखने वाले तथा ताप वर्ग के नख बाले सेनापति होते हैं
योखा से पुत अंगुष्धमध्य या अंशुमूलक मनुष्य पुत्रवान होते हैं। जिनको अंगुलियों के पर्व लम्बे हों, वे भाग्यशाली तथा दीर्घायु होते हैं।
स्निग्ध तथा गहरी रेखायें घनिकों की तथा रूखी और ऊँची रेखायें निर्धनों की होती हैं। हाथ में विरल अंगुली वाले मनुष्य निर्धन और सघन अंगुली वाले धनसञ्चय करने वाले होते हैं।
जिसकी तीन रेखा पहुँचे से निकल कर हथेली में जाय, वह मनुष्य राजा होता है। दो मत्यरेखाओं से पुत हमेला देने का होता है। यदि हाथ में अज्ञ के समान (मध्य में पता और दोनों और विस्तृत रेखा हो तो वह मनुष्य धनी, मछली
२१९ के समान हो तो विद्वान् तथा शंख, उर, पालक, हाथी, पोड़ा और कमल के समान रेखा हो जो राजा होता है। यदि कलश यात (कमल को पताका या अंकुश के समान हाथ में देखा हो तो वह व्यक्ति भूमि में घर गाड़ने वाला होता है।
क डाड हाथ में रेखा हो तो अति घनी और स्वस्तिक (राजगृह-समान) की रेखा हो तो ऐवर्यशाली होता है। यदि चक्र, खदन, फरशा, तोमर, वहीं, धनुष था धाता के समान हाथ में रेखा हो तो सेनापति और ऊखत के समान हो तो मासिक होता है।
अफर (मगा पदियाल), धन और कोशागार की तरह हाथ में देखा हो तो बहुत धनी आकारी, देवन्दिा आदि (सिंहासन, श्रीवृक्ष और सूर) या त्रिभुज की तरह हाथ में दे हो तो यह मनुष्य धार्मिक होता है।
मनुष्य के अंगुल में तिरी स्तरेखाये हो काने उसके पुत्र और जितनी मूक्ष्म रेखायें हो, उनीउको कन्या होती हैं। जिनकी तर्मनी के मूल तक तीन रेखा गई हो, वेशीवर्ष तक जीवित रहते हैं। यदि सोटी रक्षा
यदि छोटी रेखा हो तो अनुपात से आयु की कल्पना करनी चाहिये। जिनके हाथ में टूटी हुई रेखा हो, वे वृक्ष से गिरते हैं। अधिक रेखायुत या रेखारहित व्यक्ति निर्धन होते हैं।
अत्यन्त कृश और दीर्घ अघर वाले मनुष्य निर्धन एवं मांसयुत अघर वाले धनी होते हैं। विम्ब-फल के समान लाल और बक्रता से रहित
अघर वाले राजा, छोटे अधर वाले राजा तथा फटे, खण्डित, वर्णरहित और रूखे अधर वाले मनुष्य धनहीन होते हैं। मनुष्यों के स्निग्ध, घन, तीक्ष्ण और सम दाँत शुभ होते हैं।
लाल, सम्बी, लक्ष्ण और समान बीच बाले मनुष्य भोगी होते हैं। सफेद, काली और रूखी जीभ वाले पुरुष निर्धन होते हैं। इसी प्रकार मनुष्य के तातु का लक्षण भी जानना चाहिये।
सुन्दर, वर्तुलाकार, निर्मल, स्तक्ष्ण और समान मुख राजाओं का होता है। इससे उलटा (कुरूप, वक्राकार, मलिन, अश्लक्ष्ण और विषम) मुख भाग्यरहित लोगों का होता है।
खी के समान मुख वाले सन्तानहीन, गोल मुख वाले शठ, लम्बे मुख वाले निर्धन, भयानक मुख वाले धूर्त,
निम्न मुख वाले पुत्रहीन, छोटे मुख वाले कृपण एवं सम्पूर्ण तथा सुन्दर मुख वाले मनुष्य भोगी होते हैं।
आगे से विना फटी, स्निग्ध, कोमल और नीचे को झुकी हुई दाढ़ी शुभ होती है तथा लाल, रूखी और अल्प दाढ़ी वाले चोर होते हैं।
मांसरहित कान वाले मनुष्य पापकर्म से मरते हैं तथा चपटे कान वाले अधिक भोगी, छोटे कान वाले कृपण, शंकु के समान आगे से तीखे कान वाले सेनापति
रोमयुक्त कान वाले दीर्घायु, बड़े कान वाले धनी, नाड़ियों से युत कान वाले क्रूर तथा लम्बे और पुष्ट कान बाले सुखों होते हैं।
ऊंचे गाल वाले पुरुष धनी और मांसयुत गाल वाले राजा के मन्त्री होते हैं। तोते के समान नासिका बाले भोगी और सुखी, मांसरहित नासिका वाले दीर्घायु, कटी हुई को तरह नासिका
वाले अगम्या खो में गमन करने वाले, लम्बी नासिका वाले भाग्यशाली, ऊपर को खिची हुई नासिका बाले चोर, चपटी नासिका वाले खी के हाथ से मृत्यु पाने बाले, आगे से टेढ़ी नासिका
वाले धनी, ईहिनी ओर झुकी हुई नासिका वाले सर्वदा भक्षण में रत और क्रूर तथा सीधी और छोटे छिद्रों से युत सुन्दर पुट वाली नासिका खाले मनुष्य भाग्यशाली होते हैं।
जो छींकने के समय केवल एक बार छोंके वह धनी तथा दो-तीन बार मिला हुआ हादि (बोलते हुये बहुतों के मध्य में जो सुनाई दे), सानुनाद अतिदोर्ष) और पूर्वोक्त संहत (आदि, मध्य तथा अन्त में समान) छींकने वाले मनुष्य दीर्घायु होते हैं।
कमलदल के समान नेत्र वाले पुरुष घनी, लाल नेत्रान्त वाले लक्ष्मीवान, शहद के समान पीले नेत्र वाले धनी, बिल्ली के समान (कने कुहर) नेत्र वाले पापी,
हरिण के समान गोल और अबल नेत्र बाले चोर, नीले नेत्र वाले क्रूर, हाथी के समान नेत्र वाले सेनापति, गहरे नेत्र वाले
ऐश्वर्यशाली तथा नीलकमलदल के समान नेत्र वाले पुरुष विद्वान् होते हैं। अति काले तारा वाले नेत्र उखाड़े जाते हैं।
मोटे नेत्र वाले मन्त्री, कपिल वर्ण के नेत्र वाले भाग्यशाली, दीन नेत्र वाले निर्धन तथा स्थूल नेत्र वाले पुरुष धनी एवं भोगी होते हैं।
मध्य में ऊँची ५ वाले पुरुष अन्यायु, बंदी और ऊँची धूवाले अतिमुखी, विषम ( एक में बड़ी तथा एक में छोटी ५ वाले निर्धन, बाल चन्द्र की तरह झुकी हुई
पू बाले धनवान, लम्बी तथा परस्पर विना मिली ५ वाले धनी, टूटी हुई पू वाले निर्धन तथा मध्य में नत ५ वाले मनुष्य अगम्या स्त्री में गमन करने वाले होते हैं।
ऊँची तथा बड़ी संख (कनपटी) वाले धनी तथा नीची शंख वाले पुरुष पुत्र तथा धन से रहित होते हैं। टेढ़ी ललाट वाले धनी, सीप के समान विशाल ललाट वाले आचार्य,
नाड़ियों से व्याप्त ललाट वाले पाप में रत, ललाट के मध्य में ऊँची नाड़ी बाले धनी और ललाट में स्वस्तिक की तरह रेखा वाले पुरुष धनाढ्य होते हैं।
निम्न ललाट वाले वध, बन्धन के भागी और पाप कर्म में रत, ऊँचे ललाट वाले राजा तथा गोल ललाट वाले कृपण होते हैं।
मनुष्यों का दीनताहीन, आँसुओं से रहित और स्निग्ध रुदन अच्छा होता है तथा रूखे, दीन और बहुत आँसुओं से युत रुदन अच्छा नहीं होता है।
विना काँपते हुये हँसना शुभ होता है तथा आँख मूँद कर हँसने वाला पापी, बार- बार हँसने वाला दुष्ट तथा हँसने के अन्त में पुनः पुनः हँसना उन्मादयुत पुरुष का लक्षण है।
ललाट में तीन रेखा वाले पुरुष सौ वर्ष जीवित रहते हैं एवं चार रेखा वाले राजा होते हैं और पानवे वर्ष तक जीवित रहते हैं। ललाट में टूटी हुई रेखा वाले अगम्या खी में गमन करने वाले और नब्बे वर्ष जीवित रहने वाले होते हैं,
रेखाओं से रहित ललाट वाले नब्बे वर्ष जीते हैं तथा केशान्त तक रेखा वाले अस्सी वर्ष जीते हैं। पाँच रेखायुत ललाट वाले सत्तर वर्ष जीते हैं, ललाट में स्थित समस्त रेखाओं के अग्रभाग मिलें हो तो साठ वर्ष की आयु होती है।
छः, सात आदि बहुत रेखाओं से युत ललाट वाले पचास वर्ष जीते हैं। यदि ललाट में टेढ़ी रेखा हो तो चालीस वर्ष की आयु होती है। यदि ललाट में भ्रू से लगी रेखा हो तो तीस वर्ष की आयु होती है। यदि ललाट के वाम भाग में टेढ़ी रेखा हो तो बीस वर्ष की आयु होती है। छोटी रेखा हो तो वह व्यक्ति बीस वर्ष से भी कम अवधि तक ही जीवित रहता है।
यदि न्यून (एक या दो ) रेखा से युत ललाट हो तो भी बीस वर्ष से कम आयु होती है। बीच में अपनी बुद्धि से आयु की कल्पना करनी चाहिये। जैसे तीन रेखा वाले सौ वर्ष और चार रेखा वाले पश्चानबे वर्ष जीवित रहते हैं; अतः साढ़े तीन रेखा वाले साढ़े सत्तानवे वर्ष जीवित रहेंगे। इसी प्रकार अन्यत्र भी हिसाब लगा कर आयु का निश्चय करना चाहिये।
गोल शिर वाले पुरुष गायों से युत, छत्र की तरह ऊपर से विस्तीर्ण शिर वाले राजा, चपटे शिर वाले पिता-माता के घातक और करोटि (शिरस्त्राण) के समान शिर वाले दीर्घायु होते हैं।
भड़े के समान शिर वाले पुरुष पापी और निर्धन, निम्न शिर वाले प्रतिष्ठित तथा अतिनिम्न शिर वाले पुरुष अनर्थकारी होते हैं।
जिसके एक रोमकूप में एक-एक, काले, स्निग्ध, थोड़े से कुटिल, विना फूटे अग्र भाग वाले, कोमल तथा घने केश हों तो ऐसा पुरुष सुखी या राजा होता है।
एक रोमकूप में अनेक, विषम (कोई छोटे तथा कोई बड़े), कपिल, मोटे, फूटे अग्र भाग वाले, रूखे, छोटे, बहुत कुटिल और बहुत घने केश निर्धनों के होते हैं।
शरीर के जो-जो अंग रूखे, मांसरहित और नाड़ियों से प्याप्त हों, वे सभी अशुभ कहे गये हैं तथा इनसे विपरीत (स्निग्ध, मांसयुत और नाड़ियों से रहित) अंग शुभ होते हैं।
जिसके तीन अंग विस्तीर्ण, तीन गम्भीर, छः ऊँचे, चार छोटे, सात लाल और पाँच अंग लम्बे या सूक्ष्म हों, वह पुरुष राजा होता है।
पुरुषों के नाभि, शब्द, सत्त्व (एक प्रकार का चित्त का गुण अविकारं सत्त्वं व्यसनाभ्युदयागमे ) - इन तीन का गम्भीर होना तथा छाती, ललाट, मुख-इन तीन का विस्तीर्ण होना श्रेष्ठ होता है।
पुरुषों के छाती, कक्षा, नख, नासिका, मुख, कुका- टिका (पेंटू) -ये ६ अंग ऊँचे तथा लिंग, पीठ, गरदन, जंघा-ये चार छोटे हों तो शुभ देने वाले होते हैं।
पुरुषों के नेत्रान्त भाग, पादतल, हाथ, तालु, अधर, जीभ, नख- ये सात अंग रक्त वर्ण हों तो सुख देने वाले होते हैं।
दाँत, अंगुलियों के पर्व, केश, त्वचा, नख-ये पाँच अंग सूक्ष्म दुःखियों के नहीं होते अर्थात् जिनके ये अंग सूक्ष्म हों, वे सुखी होते हैं। हनु, नेत्र, बाहु, नासिका, दोनों स्तनों के मध्यभाग- ये पाँच अंग दीर्घ गायों के अतिशीत और किसी के होते हैं
छाया के लक्षण को जानने वाले मनुष्यों को शुभाशुभ फल निवेदन करने वाली और स्फटिक रत्नों से बने हुये घड़े में स्थित दीपप्रभा की तरह तेजसम्बन्धी गुणों को बाहर में प्रकाशित करने वाली छाया का विचार लेना चाहिये।
जिस प्रागी के दाँत, त्वचा, नख, रोम और सिर के बाल स्निग्ध तथा शरीर सुगन्धित हो, उसके ऊपर भूमि को छापा जाननी चाहिये। भूमि को छापा पुष्टि, पन- लाभ, अभ्युदय और प्रति दिन धर्म में प्रवृत्ति कराती है।
जल की छाया स्निग्ध, बेठ, स्वच्छ, नीली और नेत्रों को प्रिय लगने वाली होती है। यह छाया सौभाग्य, अक्रूरता, सुख और अभ्युदय करने वाली, समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाली तथा माता की तरह हित करने वाली होती है।
अग्नि की छाया क्रोधशीला, अयुष्या (किसी से तिरस्कार को नहीं पाने वाली ), कमल, अग्नि और सुवर्ण के समान कान्ति वाली तथा तेज, पराक्रम और प्रताप से युत होती है। अग्नि की छाया प्राणियों की जय के लिये होती है तथा अति शीघ्र ही अभीष्ट अर्थ की सिद्धि देने वाली होती है।
वायु की छाया मलिन, रूखी, काली और दुर्गन्धयुत होती है। यह छाया वध, बन्धन, रोग, लाभ में बाधा औन धन का नाश करती है। आकाश की छाया स्फटिक के समान कान्ति काली होती है। यह छाया भाग्ययुत, अति उदार, शुभ कार्यों की निधि के समान और स्वच्छ वर्ण वाली होती है। ३ ।
क्रम से भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश की छाया मैंने कही है। कोई-कोई मुनि दश छाया कहते हैं। जैसे पूर्वोक्त भूमि आदि की पाँच छाया और सूर्य, विष्णु, इन्द्र, यम, चन्द्र-इन पाँचों की पाँच छाया, इस प्रकार दश छाया कहते हैं; किन्तु सूर्य की छाया आदि पाँच छायाओं का लक्षण और फल भी भूमि आदि के समान ही हैं। अतः मैंने दश छाया का संक्षेप करके पाँच ही छाया कही है।
हाथी, बैल, रथसमूह, भेरी, मृदङ्ग, सिंह या मेघ के समान स्वर वाले राजा तथा गर्दभ, जर्जर (विकृत) और रूखे स्वर वाले धन और सुख से हीन होते हैं।
शरीर में मेद (हड्डियों के अन्तर्गत स्नेह भाग), मज्जा (खोपड़ी के मध्य का स्नेह भाग), चमड़ा, हड्डी, वीर्य, रुधिर, मांस-ये सात सार होते हैं। अब यहाँ संक्षेप से इनके फल कहते हैं।
जिसके तालु, ओंठ, दाँत, मांस, जीभ, नेत्र के अन्तभाग, गुदा, हाथ, पाँव-ये सभी लाल हों, वे रुधिरसार वाले मनुष्य होते हैं। रुधिरसार वाले पुरुष बहुत सुख, ली, घन और पुत्रों से युत होते हैं।
स्निग्ध त्वचा वाले पुरुष धनी, कोमल त्वचा वाले भाग्यशाली और पतली त्वचा वाले पण्डित होते हैं। मज्जासार वाले [रथा मेदसार वाले मनुष्य सुन्दर, पुत्रवान और पनी होते हैं।
अस्थिसार वाला मनुष्य मोटी ही वाला, बलवान, विद्वान् और सुन्दर होता है। वीर्यसार वाला मनुष्य गाड़े वीर्य वाला, भाग्यशाली, विद्वान् और सुन्दर होता है।
मांससार वाला मनुष्य स्थूल शरीर वाला, विद्वान्, धनी और सुन्दर रूप वाला होता है। समस्त अंगसन्धियों की सुश्लिष्टता को 'संघात' कहा जाता है। संधातयुत मनुष्य सुखी होते हैं।
पुरुष की वाणी, जीभ, दाँत, आँख, नख-इन पाँच स्थानों में स्नेह का विचार करना चाहिये। जिनके ये पाँचों स्निग्ध हों वे पुरुष पुत्र, धन और सौभाग्य से युत तथा जिनके रूक्ष हों वे निर्धन होते हैं।
राजाओं का वर्ण कान्तियुत और स्निग्ध, पुत्रवान् पनिकों का वर्ण मध्यम और निर्धनों का वर्ण रूखा होता है। पुरुष का शुद्ध स्निग्ध वर्ष शुभ और मिश्रित वर्ग अशुभ होता है।
मुख को देखकर पूर्व जन्म की कल्पना करनी चाहिये। गौ, बैल, बाघ, सिंह या गरुड़ के समान मुख वाले मनुष्य का पूर्व जन्म शुभ होता है तथा वे अपतिहत प्राप वाले और शत्रुओं को जीतने वाले राजा होते हैं।
बन्दर, महिष, सूआ या बकरे के समान मुख वाले का पूर्व जन्म मध्यम होता है तथा वे शास्त्र, धन और मुख में पुत्र होते हैं। गदहा या ऊँट के समान मुख वाले का पूर्व जन्म अशुभ होता है तथा वे धन और सुख से रहित होते हैं।
अपनी अंगुलियों से १०८ अंगुल अपनी ऊँचाई हो तो उत्तम, ९६ अंगुल हो तो मध्यम और ८४ अंगुल हो तो अधम होता है।
एक भार में दो हजार पल होते हैं। आधा भार वाला पुरुष सुखी, इससे कम भार वाला दुःखी, एक भार वाला अति धनी और डेढ भार वाला चक्रवर्ती होता है।
बीस वर्ष की खो और पच्चीस वर्ष वाले पुरुष के उन्मान और मान का विचार करना चाहिये अथवा गणित से निर्णीत आयु का चतुर्थ भाग व्यतीत हो जाने पर उन्मान और मान का विचार करना चाहिये ।
पुरुषों में भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, देवता, मनुष्य, राक्षस, पिशाच, तिरछे चलने वाले - इनका सत्त्व (स्वभाव) होता है, उनके ये वध्यमान लक्षण हैं।
भूमि प्रकृति वाला पुरुष सुन्दर पुष्पों के समान गन्ध बाला, भोगी, सुगन्धियुत भ्रास वाला और स्थिर स्वभाव वाला होता है। जल प्रकृति वाला मनुष्य अधिक जल पीने वाला, मधुर बोलने वाला और मधुर रसप्रिय होता है।
अग्नि प्रकृति वाला मनुष्य चञ्चल, खल, फूर, क्षुधा को नहीं सहने वाला और बहुत भोजन करने वाला होता है। वायु प्रकृति बाला मनुष्य चञ्चल, दुर्बल और बहुत जल्दी क्रोध के वश में आने वाला होता है ।
आकाश प्रकृति वाला मनुष्य कार्य में निपुण, खुले हुये मुख वाला, संस्कृत पद- ज्ञान में कुशल और छिद्रयुत अंग वाला होता है। देवता प्रकृति वाला मनुष्य दानी, घोड़े क्रोध वाला और प्रेमी होता है।
मनुष्य प्रकृति वाला मनुष्य गान और भूषण का प्रिय तथा बन्धुओं का उपकार करने वाला होता है।
राक्षस प्रकृति वाला मनुष्य क्रोधी, दुष्ट स्वभाव वाली और पापी होता है। पिशाच प्रकृति वाला मनुष्य चञ्चल, मलिन, बहुत प्रलाप करने वाला और मोटे शरीर वाला होता है।
तिर्यक् प्रकृति वाला पुरुष डरपोक, क्षुधा को नहीं सहन करने वाला और बहुत भोजन करने वाला होता है। इस तरह मनुष्यों की प्रकृति का लक्षण कहा गया है, जो प्रकृतिलक्षणज्ञों के द्वारा सत्त्व नाम से कही जाती है।
सिंह, हंस, मतवाले हाथी, बैल और मयूर के समान गति वाले मनुष्य राजा होते हैं। शब्दरहित और मन्द गति वाले भी धनी होते हैं तथा शीघ्र और मेढक के समान गति वाले मनुष्य दरिद्र होते हैं।
जिस मनुष्य को धकने पर सवारी, भूख लगने पर भोजन, प्यास लगने पर पानी और भय के समय रक्षक मिल जाय; मनुष्य के लक्षण जानने वाले पण्डित उस मनुष्य को भाग्यशाली कहते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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