शूर्पाकार, अस्निग्ध और पाण्डुर नख वाले तथा वक्र नाड़ियों से युत, सूखे और विरल अंगुलियों वाले पाँव दरिद्रता और दुःख देते हैं। मध्य में उत्रत पाण्डुर वर्ण के पाँव मार्ग के लिये होते हैं अर्थात् मार्ग में चलाते हैं। कषाय (कृष्ण-लोहित) पाँव वंश का नाश करते हैं। आग में पकी हुई मिट्टी के समान जिसकी पाँव की कान्ति हो, वह ब्रह्मघाती होता है। यदि पाँवतल पीले हों तो वह अगम्या ली में रत होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।