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बृहत्संहिता • अध्याय 68 • श्लोक 3
शूर्पाकारविरूक्षपाण्डुरनखौ वक्री शिरासन्तती संशुष्कौ विरलाङ्गुली च चरणौ दारिद्रयदुः खप्रदी । मार्गायोत्कटकी कषायसदृशौ वंशस्य विच्छेददौ ब्रह्मघ्नी परिपक्वमृद्‌द्युतितली पीतावगम्यारती ॥
शूर्पाकार, अस्निग्ध और पाण्डुर नख वाले तथा वक्र नाड़ियों से युत, सूखे और विरल अंगुलियों वाले पाँव दरिद्रता और दुःख देते हैं। मध्य में उत्रत पाण्डुर वर्ण के पाँव मार्ग के लिये होते हैं अर्थात् मार्ग में चलाते हैं। कषाय (कृष्ण-लोहित) पाँव वंश का नाश करते हैं। आग में पकी हुई मिट्टी के समान जिसकी पाँव की कान्ति हो, वह ब्रह्मघाती होता है। यदि पाँवतल पीले हों तो वह अगम्या ली में रत होता है।
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