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बृहत्संहिता • अध्याय 68 • श्लोक 91
चण्डाघृष्या पद्महेमाग्निवर्णा युक्ता तेजोविक्रमैः सप्रतापैः । आग्नेयीति प्राणिनां स्वाज्जयाय क्षिप्रं सिद्धिं वाञ्छितार्थस्य दत्ते ॥
अग्नि की छाया क्रोधशीला, अयुष्या (किसी से तिरस्कार को नहीं पाने वाली ), कमल, अग्नि और सुवर्ण के समान कान्ति वाली तथा तेज, पराक्रम और प्रताप से युत होती है। अग्नि की छाया प्राणियों की जय के लिये होती है तथा अति शीघ्र ही अभीष्ट अर्थ की सिद्धि देने वाली होती है।
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