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बृहत्संहिता • अध्याय 68 • श्लोक 84
नाभी स्वरः सत्त्वमिति प्रशस्तं गम्भीरमेतत्त्रितयं नराणाम् । उरो ललाटं वदनं च पुंसां विस्तीर्णमेतत्त्रितयं प्रशस्तम् ॥
पुरुषों के नाभि, शब्द, सत्त्व (एक प्रकार का चित्त का गुण अविकारं सत्त्वं व्यसनाभ्युदयागमे ) - इन तीन का गम्भीर होना तथा छाती, ललाट, मुख-इन तीन का विस्तीर्ण होना श्रेष्ठ होता है।
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