रुदितमदीनमनश्रु स्निग्धं च शुभावहं मनुष्याणाम् । रूक्षं दीनं प्रचुराश्रु चैव न शुभप्रदं पुंसाम् ॥
मनुष्यों का दीनताहीन, आँसुओं से रहित और स्निग्ध रुदन अच्छा होता है तथा रूखे, दीन और बहुत आँसुओं से युत रुदन अच्छा नहीं होता है।
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