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बृहत्संहिता • अध्याय 68 • श्लोक 110
खप्रकृतिर्निपुणो विवृतास्यः शब्दगतेः कुशलः सुशिराङ्गः । त्यागयुतः पुरुषो मृदुकोपः स्नेहरतश्च भवेत् सुरसत्त्वः ॥
आकाश प्रकृति वाला मनुष्य कार्य में निपुण, खुले हुये मुख वाला, संस्कृत पद- ज्ञान में कुशल और छिद्रयुत अंग वाला होता है। देवता प्रकृति वाला मनुष्य दानी, घोड़े क्रोध वाला और प्रेमी होता है।
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