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बृहत्संहिता • अध्याय 68 • श्लोक 1
उन्मानमानगतिसंहतिसारवर्ण- स्नेहस्वरप्रकृतिसत्त्वमनूकमादौ क्षेत्र मृजाश्च विधिवत्कुशलोऽवलोक्य- सामुद्रविद्वदति यातमनागतं वा ॥
उन्मान (अङ्गुलात्मक ऊँचाई), मान (भारीपन), गति (गमन), संहति (घनता), सार, वर्ण, स्नेह (स्निग्धता), स्वर (शब्द), प्रकृति, सत्त्व, अनूक (जन्मान्तरागमन), क्षेत्र ( वक्ष्यमाण दस प्रकार के पाद आदि), मृजा (पञ्चमहाभूत- मयी शरीरच्छाया) -इनको अच्छी तरह जानकर ही सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञाता पण्डित मनुष्यों के शुभाशुभ फल कह सकता है।
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